बिहार के नए पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति में भागलपुर का दंगा क्यों याद किया जा रहा है ?

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बिहार सरकार ने 1984 बैच के आईपीएस अधिकारी कृष्ण स्वरूप द्विवेदी को राज्य का पुलिस प्रमुख नियुक्त किया है। ये वही कृष्ण स्वरूप द्विवेदी हैं जो 1989 के भागलपुर सम्प्रदियक हिंसा के वक़्त भागलपुर में तैनात थे। भागलपुर साम्प्रदायिक दंगे में हज़ारों लोगों की जान गई थीं। कृष्ण स्वरुप को पुलिस महानिदेशक बनाए जाने पर बिहार में विपक्ष की ओर से विरोध किया जा रहा है।
राजद के प्रवक्ता मनोज झा ने कहा है जिन लोगों ने 1989 का बर्बर भागलपुर दंगा देखा है, उनके लिए द्विवेदी की नियुक्ति एक झटके की तरह है. तत्कालीन विवरण उनकी पक्षपातपूर्ण भूमिका की गवाही देते हैं. ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति से हाशिये पर खड़े लोगों और समुदायों का विश्वास और कम होगा. ऐसा लगता है कि इस नियुक्ति में आरएसएस की पसंद, नापसंद की भूमिका है. उन्होंने यह भी कहा कि द्विवेदी को पुलिस महानिदेशक बनाए जाने का निर्णय आर एस एस के हेड क़्वार्टर नागपुर में लिया गया है और बिहार के मुख्य मंत्री नितीश कुमार ने वफ़ादारी करते हुए इस पर अमल किया है।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, छात्र संघ अध्यक्ष, मशकूर अहमद उस्मानी

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, छात्र संघ अध्यक्ष, मशकूर अहमद उस्मानी ने भी बिहार सरकार के इस कदम का विरोध किया है। मश्कूर अहमद उस्मानी ने कहा हैं कि बिहार के नए पुलिस महानिदेशक-(डीजीपी) की नियुक्ति एक राजनीतिक कदम का हिस्सा है क्योंकि यह एक नियमित प्रशासनिक कदम जैसा नहीं लग रहा है। नीतीश कुमार ने दंगा-दागी, 1984 बैच के आईपीएस अधिकारी कृष्ण स्वरूप द्विवेदी को राज्य के पुलिस प्रमुख के रूप में नियुक्त किया है। 1989 भागलपुर दंगों के दौरान और बाद में, द्विवेदी ने गंभीर रूप से दंगा करने वाले लोगों को दंड से मुक्त करने की अनुमति देने के गंभीर आरोपों का सामना किया है, जिसमें 1,000 से ज्यादा लोगों की मृत्यु हुई थी। इनमें से 90% मुसलमान मारे गए और बड़े पैमाने पर मुसलमानों की संपत्तियों को नष्ट कर दिया गया था।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्र नेता सैयद हस्सानुल हक

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, विधि विभाग के छात्र सैयद हस्सानुल हक ने कहा इस पूरे घटना में सबसे अजीब बात यह है कि डीजीपी के रूप में उनकी नियुक्ति की रक्षा करते हुए बिहार सरकार ने कहा कि उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट ने अंततः द्विवेदी की याचिका को स्वीकार कर लिया था कि उनके खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियां खारिज कर दी गई हैं। हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी (बीजेपी) की भूमिका के बारे में कोई संदेह नहीं है, जो राज्य सरकार में एक जूनियर पार्टनर है। द्विवेदी जैसे डीजीपी के रूप में उन्हें एक ध्रुवीकरण का सहारा मिल गया है बिहार में जब प्रशासनिक पदों पर ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति होती है जिसके दामन पर पहले से दंगा भड़काने वाले लोगों को समर्थन देने का आरोप हो तो सरकार की नियत पर ही संदेह नहीं बल्कि सरकार की भूमिका भी दागदार लगती है।

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