यात्री गण अपने भारतीय रेल को थोड़ा जान लें !!

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भारतीय रेल को हो रहे नुकसान की खबर तो आप अक्सर सुनते ही रहते होंगे। ये कोई नई बात नहीं है। हमने तो अपने बचपन के ज़माने से ही सुन रखा है की भारतीय रेल घाटे में रहते हुए भी भारतियों को सुविधाएं प्रदान कर रहा है। कैसे प्रदान कर रहा है ये कभी नहीं बताया गया। ये कभी सुनने में नहीं आया की इस वर्ष रेलवे को इतने करोड़ का फायदा हुआ है। अच्छा चलिए करोड़ों का ना सही लाखों का ही मुनाफा हो गया हो या चलिए हज़ारो की ही बात कर लेते है। कभी तो भारतीय रेलवे को फायदा हुआ होगा। लेकिन नहीं ! ऐसी ख़बरें तो हम भारतीय शायद सपने में भी देख पाएं? कौन जाने।

indianrailway

ज़माना वो भी कोई हमारे बुढ़ापे का नहीं था जब भारतीय रेल की बागडोर संभालने श्री लालू प्रसाद यादव जी आये। आये क्या जी आते ही चमत्कार पे चमत्कार करने लगे। सुना हमने की भारतीय रेलवे को घाटे की नय्या से पार करा लाये। अजी पार क्या करा लाये साथ में डुबकी लगाते हुए 20 हज़ार करोड़ का मुनाफा भी साथ ले आये। कहते है उस ज़माने में ये मुनाफा इतना था की ONGC और रिलायंस जैसी बड़ी कंपनियों को भी पीछे छोड़ दिया। हमें तो ऐसा लगा जैसे सपने में किसी निजी कंपनी के मुनाफे की बात सुन रहे हैं। लेकिन उसको क्या कहिये जिन्होंने हमें चिकोटी काटी और हक़ीक़त से दो चार कराया। फिर क्या था लालू जी को आईआईएम जैसे ख्याति प्राप्त प्रबंधन संस्थान में व्याख्यान के लिए बुलाया गया। जैसे हार्वर्ड और वार्टन जैसे विश्वविद्यालयों में विद्वानों को व्याख्यान के लिए बुलाया जाता है। विद्यार्थियों ने सवालों की बौछार लगा दी। बताइये साहब कैसे किये ये सब। लालू जी भी कहाँ कम थे। लगे बखान करने, वैसे भी उनके पेट में बात कहाँ पचनी थी। उन्होंने ने ना सिर्फ सारी राज़ की बात उगल दी बल्कि भविष्यकाल की योजनाओं का भी लेखा जोखा उभार कर रख दिया। आईटी परियोजनाओं के द्वारा निवेश करने की रणनीति, टिकट वेंडिंग मशीन का इस्तेमाल और हाँ याद आया ऑनलाइन टिकट की सुविधा, कैटरिंग और टूरिस्म जैसी योजनाओं का भी बखान कर दिया। इतना सब कुछ करने के बाद भी नहीं थके तो यात्रियों के किराये पर भी कैंची चला दी। कैंची चलाई तो चलाई जेनरल में सफर करने वालों के लिए गद्दे का भी इंतेज़ाम कर दिया। भला हो लालू जी का जिन्होंने गरीबों पर इतने उद्धार किये।

Lalu Prasad Yadav

चमत्कारी दुनिया से अप्सराये की बाते तो सुनी थी लेकिन लालू जी ने तो अपनी चमत्कारी दुनिया से ना सिर्फ ऐसे स्रोतों को निकाल लाये जहाँ से भारतीय रेलवे को मुनाफा हो बल्कि अपनी दुनिया से हम जैसे गरीबों के लिए रथ भी ले आये। रथ भी ऐसा की खुद इंद्रदेव भी बैठने की कामना करें। अब बताये भला ऐसा भी कोई करता है। वो भी वह शख्स जिस पर दसियों घोटाले के आरोप लगे हों।

खैर साहब अब तो ज़मान महामना, हमसफ़र, तेजस, गतिमान, महाराजा और जाने कैसी कैसी लक्ज़री ट्रेनों का है। जो कम से कम बिहार, झारखण्ड, उड़ीसा और बंगाल जैसे राज्यों को तो छूती भी नहीं। छूवे भी कैसे यहाँ कौन से महाराजा या अम्बानी और बिड़ला ने अपना आशियाना बना रखा है। इन राज्यों के लिए तो वही ढाक के तीन पात। कोई भी नई ट्रेने इन राज्यों की किस्मत में कहाँ। और जो हैं वो इतने लेट लतीफ़ की यात्री भी पहले से मन बनाये रहते हैं। वैसे इन राज्यों के CM को तो इन बातों की पड़ी नहीं है तो बेचारे प्रभु जी की माया तो अपरमपार है। अभी चार दिन पहले ही प्रभु जी ने उपदेश दिया है की वो भारतीय रेलवे में स्वछता, समय की पाबंदी, सुरक्षा और कैटरिंग जैसी सुविधाओं के सम्बन्ध में निकट भविष्य में रेटिंग सिस्टम लागु करेंगे। अब बताइये साहब प्रभु जी को भी अपने अनुयायियों का हाल जानने के लिए इलेक्ट्रॉनिक यंत्रों का सहारा लेना पड़ रहा है। वैसे हमारे प्रभु जी ट्विटर पर काफी सक्रीय रहते हैं। ये और बात की अनुयायियों की दुविधाओं का समाधान करने में कभी कभी असमर्थ हो जाते हैं।

Indian Rail

खैर ! देखा जाये तो उपरोक्त राज्यों से यात्रियों का एक रेला निकलता है जो रेल के किसी डब्बे में समाता नहीं इसी लिए तो इन्हे ठूस दिया जाता है ताकि किसी तरह ये अपनी मंज़िले मक़सूद तक पहुँच जायें। जो लोग जेनरल में सफर करने के आदि हैं उनका क्या कहिये लेकिन जो स्लीपर श्रेणी में सफर करते है वो भी जेनरल श्रेणी का आनंद लिए बिना नहीं रह पाते। खैर कहिये उस तीसरे दर्जे की AC श्रेणी का जो कुछ लोगो को राहत दिए हुए है। त्योहारों और खास मौकों पर तो वो राहत भी गारत में तब्दील हो जाती है। अब इसमें मंत्री लोग भी क्या करें। बिहार / झारखण्ड में त्यौहार का भी तो रेला लगा रहता है उस पर यात्रिओं का हुजूम की थमने का नाम नहीं लेता। रेले पे रेला भला रेल के किस डिब्बे में समाये। और किराया है की आसमान छूने को हमेशा बेताब रहता है। अभी चार बरसों के भीतर की ही बात है। गरीबों का रथ हम गरीबों को रांची से दिल्ली 650 सौ रूपये में ले जाया करता था। और आज एक हज़ार दस रूपये में। इस पर टिकट मिलने की परेशानी का रोना तो हमने रोया ही नहीं। अब तंग भी आ चुके है भला कितना रोयें।

इन सब के बाद मंत्री जी कहते हैं भारतीय रेल घाटे में चल रहा है इसलिए आप से अनुरोध है की आप को दी जाने वाली सब्सीडी का आप त्याग करें। हम तो भैया चकरा के रह गए। हज सब्सीडी सुना था। गैस सब्सीडी भी सुन लिया।अब इ रेलवे की सब्सीडी कौन सी बला है भैय्या। भैया हमै तो आज पता चला की सरकार हमको रेलवे टिकट पर भी सब्सीडी देती है।

तो का करें वापिस कर दें ? और जो हम टैक्स देते हैं उसका क्या ? सड़कों की हालत वैसे ही जर्जर। सरकारी अस्पतालों और स्कूल्स की हालत दयनीय। बिजली व्यवयस्था चोरी छुपे धप्पा मार के जाने वाली है। सोशल सिक्योरिटी के नाम पे एक तमाशा है जो उन्मादी भीड़ों के द्वारा मारे जाने वालों की तस्वीरें बनाने का काम करती है। कानून वयवस्था के नाम पे लीपा पोती है। रोज़गार के नाम पर भी सरकार द्वारा सिर्फ पैसे ही बनाये जाते हैं। आकड़ें बताते है की पिछले तीन बरसों में रोज़गार की दर अपने निचले स्तर पर है। ऐसे में किस टैक्स की बात करें। खैर एक तुर्फा तमाशा है जिसका कोई अंत नहीं।

चलिए छोड़िये इन बातों को, मुद्दे पर आते है। तो मुद्दा ये है की एक समाजी कार्यकर्ता हैं चंद्रशेखर गौड़ उन्होंने ने RTI के द्वारा यह जानकारी मांगी थी की रेलवे जिन आरक्षित टिकटों को रद्द करती है उससे रेलवे को कितनी कमाई होती है। आंकड़े देख कर चौकिएगा मत क्यूंकि यह सिर्फ एक मात्र श्रोत है इसके अलावा दूसरे कई ऐसे भी श्रोत हैं जिनसे रेलवे की मोटी कमाई होती है लेकिन बेचारी आम जनता को इससे क्या सरोकार। बेचारी जनता तो अभी सब्सीडी के चक्कर ही में घनचक्कर बने हुए है। आंकड़े बताते हैं की वित्तीय वर्ष 2016-17 में रेलवे को आरक्षित टिकट्स रद्द करने से लगभग 14.07 अरब रूपये का मुनाफा हुआ है। ज्ञात हो की आरक्षित टिकट रद्द करने के बदले मूल टिकट राशि से कटौती के ज़रिये टिकट निरस्तीकरण शुल्क वसूला जाता है। इस शुल्क से रेलवे की जो तिजोरी भरी है वो पिछले बरस के मुकाबले इस वर्ष 25.29 प्रतिशत ज़्यादा है। आंकड़े ये भी बताते है की वित्तीय वर्ष 2015-16 में 11. 23 अरब, 2014-15 में 9.08 अरब रूपये और 2013-14 में लगभग 9.38 अरब रूपये की रेलवे को कमाई हुई है। आप को ये भी बताते चले की टिकट निरस्तीकरण में साल 2015 में बड़े बदलाव किये गए। जिसके मुताबिक टिकट निरस्तीकरण के शुल्क को पहले के मुकाबले दोगुना कर दिया गया है।

Passengers of Indian railway in queue

ये तो बात आरक्षित टिकटों के सम्बन्ध में थी। ऑनलाइन अनारक्षित टिकट को लेकर बेचारे यात्री तो और भी परेशान किये जाते हैं। यह टिकट अगर कन्फर्म ना हो तो अपने आप रद्द हो जाती है और इस सारी परिक्रया में यात्रिओं से शुल्क भी वसूल लिया जाता है। मतलब यह की खाया पिया कुछ नहीं गिलास तोडा बारह आना। अब कोई बताये बेचारा आम आदमी क्या करे। बात इतने पर ही खत्म नहीं हो जाती। लम्बी रूट वाले लगभग हर लाइन में आरक्षित टिकट मिलने की समस्या एक जैसी है। लोग चार महीने पहले (यानि टिकट आरक्षित करने की शुरुआती तिथि) टिकट आरक्षित करवाने की कोशिश में लगे रहते हैं। ना मिल पाने की सूरत में आम जनता वेटिंग में ही सफर करने को मजबूर है। अब ज़रा इस पर भी गौर करें की स्लीपर कोच में वेटिंग लिस्ट की सीमा 400 है, थ्री टेयर AC में यह लिमिट 300 है, और 2A में 100 और फर्स्ट क्लास में 30, 30 यह लिमिट है। यानि कुल मिला कर आरक्षित सीट के अतिरिक्त लगभग 850 अधिक यात्री रोज़ाना सफर करते हैं। इनमे उनकी गिनती ही नहीं की गयी जो अनायास ही सफर के लिए निकल पड़ते हैं। यानि टीटी से ले दे कर किसी तरह सफर कर लेते हैं। इन सब के बाद टिकट की काला बाज़ारी का मसला अलग ही है। यह संपूर्ण तो नहीं लेकिन जितने तथ्य सामने रखे गए उनको देख कर मुझे तो समझ नहीं आता की भारतीय रेलवे कैसे घाटे में चल रही है और सरकार है की आम जनता को सब्सीडी देने के बाद उस पर एहसान का एक लेबल टिकट के साथ दे देती है। अब तो सब्सीडी भी ना लेने की अपील की जाती है। भला कोई देश के इन नेताओं को बताये की जिन पैसों पर ये मंत्री लोग सारी सुविधाएँ भोगते हैं ये दर असल उन एक अरब आम भारतियों के द्वारा दिए गए टैक्स की बदौलत है। लेकिन क्या कभी किसी भारतीय ने टैक्स देने के बाद एहसान जताया है। क्या किसी भारतीय ने इन मंत्रियों के सर्टिफिकेट या आधार कार्ड पर एहसान का ये लेबल चिपकाया है। नहीं ना ! बात निकली है तो दूर तलक जाएगी। आप कहाँ तक मेरे साथ चलोगे। कभी अपने अक्ल के घोड़े भी दौड़ा लिया करें।

 

इमरान अहमद (रिसर्च स्कॉलर, दिल्ली यूनिवर्सिटी)

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