जिग्नेश का हल्ला, कोविंद का नहीं !

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हरि शंकर व्यास

 

वजह नरेंद्र मोदी और अमित शाह है। इसे इन दोनों नेताओं ने भी नहीं समझा होगा। इसलिए कि ये अपनी जिस दुनिया में जी रहे है उसमें इनका व्यवहार भगवान विष्णु के अवतार सा है। ये अपने मनोविश्व में प्रजा को दो नजर से देखते है। आस्थावान भक्त या नास्तिक दुश्मन में! तभी पिछले पौने चार सालों में भारत राष्ट्र-राज्य में जो हुआ है वह या तो नरेंद्र मोदी की बांटी हुई प्रसादी है या जनता को जकड़ने का दमन है। इसका पर्याय एक तरफ रामनाथ कोविंद है तो दूसरी और जिग्नेश मालवाणी है। दोनो दलित। एक राष्ट्रपति भवन के महल में नरेंद्र मोदी की कृपा से राष्ट्रपति है तो दूसरा दलित बस्तियों में घूमता वह फकीर है जो मोदी के खिलाफ चाहे जो बोल दे रहा है! दोनों के बनने की स्थिति नरेंद्र मोदी-अमित शाह प्रदत्त है। इससे यह बात भी निकलती है कि मोदी-शाह ने गुजरात में भाजपा नेता पैदा नहीं किए लेकिन जिग्नेश, अल्पेश, हार्दिक जरूर पैदा कर दिए!  मैंने पिछले एक सप्ताह में जिग्नेश- उमर का जितना हल्ला सुना है उससे दिमाग यह सोचते भन्नाया हुआ है कि नरेंद्र मोदी-अमित शाह क्यों कर यह नहीं सोच पाते कि इन्हे देशद्रोही के नाते जितना प्रचारित करवाओंगें उतना वह आगे समाज को तोड़ने वाला होगा। सोचे, जिग्नेश में हिम्मत आ गई जो एक हाथ में मनुस्मृति और दूसरे में संविधान की प्रति ले कर दिल्ली में प्रधानमंत्री दफ्तर की और मार्च करें।

हिसाब से पीएमओ दफ्तर के बगल राष्ट्रपति भवन विशालकाय है और वहां दलित रामनाथ कोविंद बतौर राष्ट्रपति विराजमान है। जब भारत का प्रथम नागरिक और सर्वोच्च पद पर आसीन दलित है तो क्या वह मोदी-शाह की संविधान में आस्था का प्रमाण नहीं है? पौने चार साल में यदि सबसे बडे पद पर नरेंद्र मोदी-भाजपा ने दलित को बैठाया है तो अपने आप यह बात जिग्नेश और दलितों को संतुष्ट करने वाली क्योंकर नहीं कि ये सच्चे संविधान पालक है। यदि मनुस्मृति को मान रहे होते तो क्या दलित राष्ट्रपति पद पर बैठा होता? 

जाहिर है जिग्नेश का भाजपा-संघ परिवार को मनुस्मृति प्रतीक बताना फ्राड है। झूठा है। यह उसकी अपना हल्ला बनवाए रखने की नौटंकी है।

पर हल्ला ही तो भीड़ बनवाता हैं। सो गौर वाली बात यह है कि रामनाथ कोविंद बतौर राष्ट्रपति क्यों नहीं देश के दलितों में विश्वास के, भीड़ के, हल्ले के आकर्षक है?  कोई भी इस थीसिस में एक शब्द नहीं बोला कि जब दलित राष्ट्रपति है तो दलित अत्याचार, उनकी सुनवाई न होने की बात कहां से आती है! किसी ने यह नहीं कहां कि अमित शाह दलितों के घर जा कर खाना खाते है तो प्रधानमंत्री मोदी के अपने इलाके वडगांव में जिग्नेस मेवानी को क्यों दलित वोट दे? 

सचमुच कोई माने या न माने, पिछले पौने चार साल में हिंदू समाज की अलग-अलग फांकों में यदि भाजपा को लेकर मौन बैचेनी यदि आज किसी में सर्वाधिक है तो वह दलित-आदिवासी समाज में है। झारखंड, छतीसगढ़, मध्यप्रदेश से ले कर महाराष्ट्र सभी तरह आदिवासी और दलित मनोदशा से एक अलग ही तरह का खिंचाव बनता लगता है। पहली बार यह खिंचाव दलित मानस को मुसलमान का हमराही इसलिए बना रहा है क्योंकि रोजी रोटी, धंधे और खानपान का मसला गौवंश कारोबार के पेंच से भी साझा है। भले देर से हो पर उत्तरप्रदेश में इसके असर होंगे। दिशा बन रही है।

और उत्तरप्रदेश के ही रामनाथ कोविंद भी है। उत्तरप्रदेश का दलित यूथ भीम सेना के चंद्रशेखर के जेल में पड़े होने से आगे क्या करवट लेगा यह वक्त बताएगा लेकिन इतना तय माने कि मोदी-शाह ने जिग्नेश-उमर की बदनामी जैसे यदि केंपैन चलवाए रखे और दलित-मुस्लिम साझा की हवा बनवा दी तो लेने के देने पड़ेगे। सोचने को आप सोच सकते है जब यूपी के रामनाथ कोविंद बतौर तुरूप भाजपा के पास है तो चंद्रशेखर, जिग्नेश, वेमूला, कांग्रेस या मायावती के हल्ले  में दलित क्यों बहकेगें?  नई भीमसेना और  उसके चंद्रशेखर का क्या मतलब है? 

बहुत मतलब है। अपने को हाल के महिनों में दलित आंदोलन, दलित जमावड़े, गुजरात चुनाव, महाराष्ट्र बंद की जितनी तस्वीरे दिखलाई दी है उन सबमें दलित नौजवानों की भीड का सैलाब दिखा तो इनकी नई राजनैतिक चेतना और संकल्प के भी बीज दिखलाई दिए। अपने आपमें जिग्नेश और चंद्रशेखर दोनों दलित यूथ के प्रतिनिधी चेहरे है। इनमें याकि बहुसंख्यक दलितों में अनचाहे- चुपचाप ऊंची जातियों के उत्पीडन का घाव हरा हुआ है। यह विचित्र स्थिति है। नरेंद्र मोदी ने देश के सर्वोच्च पद पर दलित को बैठाया। इसी दिशंबर में दिल्ली में डा अंबेडकर के नाम की संस्था की विशाल इमारत का उद्घाटन किया। दलितों के लिए दस तरह की योजनाएं बनाई। आए दिन वे डा अंबेडकर का नाम लेते है। अमित शाह दलित के घर जा कर खाना खाते है। तब भला क्यों दलित नौजवान नई भीम सेना, चंद्रशेखर या जिग्नेश मवानी की भीड बन रहे है या महाराष्ट्र में एक घटना पर इतने सड़कों पर उतरे!

इसलिए कि वह, आम दलित अपने को अशक्त हुआ मान रहा है। और यह बीमारी आज पूरे समाज को है। नरेंद्र मोदी-अमित शाह ने भले बनाया हो रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति। लेकिन उनका राष्ट्रपति होना कुल मिलाकर पिंजरे में बंद तोते का मैसेज लिए है। कोविंद दलितों में या कोई भी बड़ा पदासीन चेहरा अपनी जात, अपने समाज में बिना अर्थ लिए हुए आज इसलिए है क्योंकि सृष्टि जब विष्णु भगवान की रची हुई है, नरेंद्र मोदी ही सर्वेसर्वा है तो बाकि देवी-देवताओं का क्या मतलब? सारा पॉवर एक के पास तो बाकि में पॉवर कहां?  तभी क्या आपने कोई मौलिक बात, धमक वाली कोई बात रामनाथ कोविंद से सुनी है? इन बेचारे राष्ट्रपति की हालत तो यह है कि इनके सचिव से ले कर प्रेस सचिव सब खुद नरेंद्र मोदी ने निज पसंद से बनाए। वहां गुजरात के अपने भरोसेमंद अफसरों को बैठा कर उसे पीएमओ का एक्सटेंशन बना दिया। और यह भी जरूरी नहीं समझा कि डा अबेंडकर की किसी तिथी या उनके नाम के विशाल संस्थान में कोविंद से उद्घाटन या भाषण को यह सोचते हुए अपने जैसे पैमाने में प्रसारत करवाते कि दलित के मुंह से दलित महानायक पर बोला दलित समुदाय में ज्यादा ग्राहय होगा!

इसलिए आज रामनाथ कोविंद का होना या न होना अर्थहीन है तो जिग्नेश मवानी, चंद्रशेखर वह आवाज है जिससे दलित जुडाव पा रहा है। दलित यूथ  मायावती, रामविलास पासवान, उदितराज, रामनाथ कोविंद सबसे आगे बढ़ा हुआ अपने को उसी मनोदशा मे पा रहा है जैसे गुजरात में पटेल नौजवान हार्दिक पटेल के दिवाने बने हुए है। कहने को आप कह सकते है कि इन चीटियों का, इन चिल्लर नेताओं का क्या मतलब? 

मतलब है। महाराष्ट्र की सड़कों पर दलित नौजवानों का हुजूम याद करा गया हार्दिक पटेल की पहली सभा के बाद बिगडे नौजवानों के मूड को या चंद्रशेखर की भीम सेना के पहले शो को। मैं इसका अर्थ सभी जातियों के नौजवानों की बैचेनी और जांत- राजनीति में सभी को अशक्त बनाने, शक्तिहीन बनवा देने वाली मोदी राज की शैली का दुष्परिणाम मानता हूं।

 

 

 

 

 

 

 

लेख नया इंडिया के सौजन्य से

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