राम मंदिर से भी बड़ा है, हिंदू राष्ट्र का ब्रह्मास्त्र!

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पिछले कुछ वर्षों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में एक चिंतन तो चल रहा है कि देश की सियासत के वास्ते दूसरी पांत तैयार हो, जो युवा होने के साथ-साथ ‘गैर ब्राह्मण हिंदू राष्ट्रवाद का ब्रांड अंबेसडर’ भी बने। योगी आदित्यनाथ में इस तरह की संभावनाएं ढूंढने में विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष अशोक सिंहल सहायक रहे थे, जिन्होंने नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र बनाने के महाभियान में योगी आदित्यनाथ को जोड़ लिया था। अपने आखिरी सांस तक अशोक सिंहल भी इस गैर ब्राह्मण हिंदू राष्ट्रवाद के ध्वज वाहक रहे थे। 

वीकेएस अयंगर को कितने लोग जानते हैं? सर्वे हो, तो नतीजा निराश करेगा। ये  उन चंद लोगों में से थे, जिनकी वजह से भारतीय योग को विश्व मंच पर पहचान मिली थी। आज जो राष्ट्रवादी नेता चौड़े होकर बोलते हैं कि हमारी सरकार ने योग को संयुक्त राष्ट्र में मान्यता दिलाई, उन्हें भी नहीं पता कि वेल्लुर कृष्णनामचार सुन्दराराजा (वीकेएस) अयंगर किस चिड़िया का नाम है। 20 अगस्त 2014 को 95 साल की उम्र में वीकेएस अयंगर के प्राण पखेरू उड़ गये। अभी हाल में पेइचिंग यात्रा के दौरान एक डाकधर में वीकेएस अयंगर के पोस्टल स्टांप देखने पर मुझे उनकी लोकप्रियता का अहसास हुआ।

 2011 में वीकेएस अयंगर चीन गये थे, उन्होंने योग के प्रति वहां की युवा पीढ़ी में अपार उत्साह को देखने के बाद टिप्पणी की थी कि हमें डर है, चीन कहीं योग का ब्रांड एम्बेसडर न बन जाये। वीकेएस अयंगर के शैदाइयों में से मशहूर म्युजिशियन येहुदी मेहुनिन भी हुआ करते थे। 1951 के किसी कन्सर्ट में येहुदी मेहुनिन भारत आये थे। इस महान संगीतकार ने अपने संस्मरण में लिखा, ‘बाज़ दफा मेरी ऊंगलियों और बाजू में वायलिन बजाने की वजह से दर्द का अहसास होता था। वीकेएस अयंगर ने मुझे ऐसे आसन बताये, कुछ दिन उसे करने के बाद दर्द ग़ायब हो चुका था।’ वीकेएस अयंगर के लाखों अनुयायी यूरोप, अमेरिका में थे। योग के लिए वीकेएस ने जो कुछ किया, खामौशी से किया। और उतनी ही खामौशी से दुनिया को अलविदा कह गये। 

मगर, इस राजनीति के द्वंद्वात्मक भौतिकवाद ने योग और धर्म के मायने को ही पलट दिया। सब कुछ प्रचार केंद्रित। लेकिन विचित्र कि दक्षिण भारत में उत्तर से अधिक अंध विश्वास और कर्मकांड है, मगर एक भी ऐसा नेता नहीं दिखता है, जो हिंदू धर्म का ब्रांड एम्बेसडर हो। एमजीआर से लेकर, एनटीआर, जयललिता जैसों ने सर्वाधिक धार्मिक फ़िल्मों में काम किया, मगर ऐसा क्या था कि अपने राजनीतिक चेहरे को धार्मिक वोट बैंक के अनुरूप नहीं ढाला? उनके बाद की फिल्म स्टार वाली राजनीतिक पीढी विमर्श के इस दायरे से बाहर है। इसके ठीक उलट उत्तर भारत में जो लोग चाय बेचने से लेकर तंबाकू-तेल का व्यापार करते हुए सत्ता के शिखर तक पहुंचे, उन्हें लक्ष्य प्राप्ति में धर्म का सबसे बड़ा सहारा मिला। 

योगी आदित्यनाथ केरल में भीड़ नहीं जुटा पाये, ऐसे विजुअल्स टीवी वाले नहीं दिखा रहे थे। मगर, एक सवाल तो बनता है कि ऐसे नेता और हिंदू राजनीति के फायर ब्रांड जब दक्षिण भारत की सभाओं को संबोधित करते हैं, तब हिंदू धर्म की चेतना का संचार क्यों नहीं होता? उनमें राम मंदिर को लेकर उन्माद क्यों नहीं फैलता? दक्षिण के लोग अयोघ्या में पौने दो लाख दीप प्रज्ज्वलित होते देखकर आह्लादित क्यों नहीं होते? आजकल मंच पर ही नेताओं के भाषण का अनुवाद होता है, चुनांचे भाषा भी अब रगों में ख़ून दौड़ाने के रास्ते बाधक नहीं है। 

दीगर है, उत्तर भारत में जब-जब दंगे हुए, दक्षिण शांत रहा। केंद्र में सत्ता के साढे तीन साल के दौर में यह भी ग़ौर करने लायक बात है कि वहां जिनसे राजनीतिक, वैचारिक मतभेद होते हैं, उन्हें पाकिस्तान भेज दिये की ललकार शायद ही सुनाई देती है। दक्षिण की इस सामाजिक-राजनीतिक तासीर बदलने में विश्व की सर्वाधिक सदस्यों वाली पार्टी कामयाब क्यों नहीं हो पायी? इस सवाल का बेहतर उत्तर बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह ही दे सकते हैं। प्रसंग से हटकर एक बात और, आधार कार्ड के बिना पर बीजेपी के एक-एक मेंबर की पुष्टि कराई जाये, तो सदस्यता के इस फर्जीवाड़े की पोल एक झटके में खुल जाएगी।

सबको लगता रहा है कि 2019 का सबसे सुषुप्त राजनीतिक ज्वालामुखी राम मंदिर है, जिसके जागृत होते ही 80 प्रतिशत हिंदू वोट बैंक का एक बार फिर से ध्रुवीकरण हो जाएगा। मगर, जिस विषय को हिंदू राजनीति के चोबदार बार-बार जागृत करते रहे, क्या उसमें उतनी मारक क्षमता रह गई है? दीपावली से एक दिन पहले योगी आदित्यनाथ क्या उसी मारक क्षमता का परीक्षण अयोध्या में कर रहे थे? योगी सरकार द्वारा प्रायोजित मीडिया का यदि कवरेज नहीं होता, तो कलियुग में त्रेता युग को धरती पर उतार ले आने का पाखंड धरा का धरा रह जाता। 

मीडिया में जो ब्रांडिंग शुरू है, उससे लगता है जैसे मोदी का विकल्प तैयार किया जा रहा है। योगी क्या हिंदू जागरण के नये ब्रांड अंबेसडर के रूप में स्थापित किये जाने की प्रक्रिया से गुज़र रहे हैं? और क्या इस पूरे गेम प्लान को नागपुर तय कर रहा है? उत्तर प्रदेश में योगी शासन के सात महीने पूरे होने जा रहे हैं, इन सात महीनों का रिपोर्ट कार्ड एक ऐसे स्कूली छात्र का हो गया है, जिसके माता-पिता ‘टीचर पेरेंट्स मीटिंग्स’ में जाते ही नहीं। जब अयोध्या में दीपोत्सव हो रहा था, उन घंटों में गोरखपुर में दस बच्चे दम तोड़ गये थे। पूरे सात महीने कितने सौ बच्चे गोरखपुर में अस्पताल और शासन की लापरवाही से मर गये, इसे स्वीकार करने के बदले सरकार ने हिंदू अजेंडा को ही अस्त्र बना लिया है। 

आरएसएस के थिंक टैंक लंबे समय से उस चेहरे की तलाश में है, जो गैर ब्राह्मण हिंदूवाद के मार्ग को प्रशस्त करे। यह कल्याण सिंह के माध्यम से पूरा नहीं हो सका था। 2014 के चुनाव में मोदी मूलत: हिंदूवाद के प्रतीक नहीं बन पाये थे, न ही उनके वोट बैंक ने मोदी में भगवान राम का अक्स ढूंढा था। योगी आदित्यनाथ का वोट बैंक उनमें राम, उनकी क्षत्रिय जाति की वजह से भी ढूंढ रहा है। मोदी को वोट ज्यादातर उन लोगों ने दिया जो मंहगाई, भ्रष्टाचार, परिवारवाद, और कांग्रेस नेताओं के अंदर पनप चुके अहंकार का हिसाब चुकता करना चाहते थे।  

नागपुर ने महसूस कर लिया है कि नोटबंदी, जीएसटी की छद्म उपलब्धियों का बखान करने से गुजरात और शेष देश पर दोबारा फतह का सपना टूट भी सकता है। पीएम मोदी को इन दिनों ध्यान से देख,ें तो उनका पहले जैसा प्रभामंडल निस्तेज होता दिख रहा है, जो 2014 के पूर्वार्ध में देखने को मिलता था। वे अब थके हारे शासनाध्यक्ष जैसे लगने लगे हैं, जिन्हें संगीत सोम जैसे मामूली से विधायक के बयान पर खुद के स्टैंड को स्पष्ट करना पड़ रहा है। सवा सौ करोड़ मतदाताओं का प्रतिनिधि इतना अशक्त, निरीह सा दिखने लगेगा, आश्चर्य! किंतु सत्य यही है।

पिछले कुछ वर्षों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संध में एक चिंतन तो चल रहा है कि देश की सियासत के वास्ते दूसरी पांत तैयार हो, जो युवा होने के साथ हिंदू राष्ट्रवाद का ब्रांड अंबेसडर भी बने। योगी आदित्यनाथ में इस तरह की संभावनाएं ढूंढने में विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष अशोक सिंहल सहायक रहे थे, जिन्होंने नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र बनाने के महाभियान में योगी आदित्यनाथ को जोड़ लिया था। अपने आख़िरी सांस तक अशोक सिंहल भी गैर ब्राह्मण हिंदू राष्ट्रवाद के ध्वज वाहक रहे थे। 

नेपाल में नाथ संप्रदाय का सियासत में हस्तक्षेप कुछ इसी तरह का था। गोरखनाथ, मच्छेन्द्रनाथ का इतिहास खंगालने पर उसका एक सिरा गोरखपुर के उस गोरखनाथ मठ में भी मिलता है, जहां से योगी आदित्यनाथ संबंध रखते हैं। मच्छेन्द्रनाथ स्वयं पिछड़ी जाति से थे। मगर एक समय आया जब गोरखनाथ मठ पौढी गढ़वाल के बिष्ठ क्षत्रियों के आधिपत्य में आ चुका था। उसकी कथा भी दिलचस्प है। गोरखपुर मठ के मुख्य महंथ दिग्विजय नाथ और उनके बाद अवैद्यनाथ हिंदू महासभा की राजनीति के प्रमुख चेहरे थे, जो क्रमश: गोरखपुर से बीजेपी के सांसद भी बने। यह अवैद्यनाथ ही थे, जिन्होंने अपने स्वजातीय आदित्यनाथ को गोरखनाथ मठ का उत्तराधिकारी के रूप में तैयार किया था। 

खै़र ! योगी आदित्य नाथ के विराट होते स्वरूप को समझने के वास्ते नेपाल को एक बार फिर जानना होगा। 1950 के बाद वाले नेपाल में एक थे योगी नरहरिनाथ। उन्होंने शाह राजाओं के राजनीति में सक्रिय रहने की सबसे अधिक वकालत की थी। क्षत्रिय संत होने के कारण योगी नरहरिनाथ ने नेपाल नरेश पृथ्वी नारायण शाह की सत्ता को सार्वभौम बनाने के वास्ते काफी दस्तावेज जुटाये थे। योगी नरहरिनाथ काठमांडो के पशुपतिनाथ परिसर में समाधिस्थ हैं, उसी के पास एक कमरे में वो सारे दस्तावेज हैं।

यह महज संयोग नहीं कि सत्तारूढ़ नेपाल का शाह वंश क्षत्रिय कुनबे से था। उस दौर में बड़े बारीक खेल हुए। ब्राह्मणों को नेपाल में हिंदूवाद का प्रतीक न बनने देने में योगी नरहरिनाथ ने काफी सारे पौराणिक प्रतिमान, दस्तावेज जुटाये जिसके कारण नेपाल की प्रजा ने मान लिया था कि नरेश भगवान विष्णु के अवतार हैं, और उनके शब्द देवताओं की वाणी की तरह हैं, जो कानून से ऊपर हैं। उसी क्रम में नेपाल संवैधानिक रूप से हिंदू राष्ट्र भी घोषित हो गया था। मगर, माओवादियों के सत्ता में आने के बाद सत्ता और धर्म का संगम नदी के दो किनारों की तरह बंट गया। 2008 में राजा का पद समाप्त करने के साथ-साथ नेपाल विश्व का एकमात्र हिंदू राष्ट्र भी नहीं रह सका। 

 इस खेल से वो लोग खुश हुए, जो नेपाल अधिराज्य में ब्राह्मण वर्चस्व वाली हिंदू राजनीति करते थे। उनके कलेजे को ठंडक पहुंची थी। बाद के दिनों में योगी आदित्यनाथ कई अवसरों पर पूर्व नेपाल नरेश ज्ञानेंद्र के साथ मंच साझा करते रहे। हर बार संकल्प होता कि नेपाल को हिंदू राष्ट्र फिर से घोषित कराना है। 81.3 फीसदी नेपाली जनता की भावनाओं को अब भी उकसाने की चेष्टा विभिन्न अवसरों पर होती रही है। इस समय परदे के पीछे यही परिकल्पना हो रही है कि दक्षिण एशिया में एक ‘ग्रेटर हिंदू राष्ट्र’ बने। लेकिन, क्या इस वृहद् हिंदू राष्ट्र के ध्वज वाहक योगी आदित्यनाथ होंगे? इस सवाल का उत्तर नये साल में मिलना आरंभ हो जाएगा!

 

 

 

 

 

 

 

देशबंधु के सौजन्य से

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