मुसलमानों को पाकिस्तान मुर्दाबाद कहने के लिए क्यों मज़बूर किया जाता है ?

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लेख़क: रहमत कलीम

 

जब से केंद्र में मोदी सरकार आई है तब से देश में दो चलन बहुत ही आम हो गया है. एक तो यह है की भाजपा समर्थक हर नुक्कड़ और हर गली चौराहे पर आपसे आपकी देशभक्ति का सर्टिफिकेट मांगने लगे है और आप की देशभक्ति को अपने अंदाज़ में नापने लगे हैं. दूसरी बात यह है की भाजपा आरएसएस समर्थकों ने मुसलमानों को पूरी तरह से देश के खिलाफ समझ लिया है, जिस के कारण कभी उन से देशभक्ति साबित करने को कहा जाता है तो कभी भारत माता की जय , वंदे मातरम और जय श्रीराम के नारे न लगाने पर गद्दार,देश विरोधी,आतंकवादी और पाकिस्तान प्रेमी कहा जाता है। लेकिन इन तमाम बातों के पीछे देश नहीं होता,बल्कि वो हिंदुत्वा ताक़त और उसकी विचारधारा होती है जिसको हम मुसलमानों पर थोप कर अपनी शक्ति का और हमारी कमज़ोरी का हमें एहसास दिलाने की कोशिश करते हैं .

लेकिन इन समस्त बातों में एक चीज़ सब से अजीब है,वो यह की हिंदुत्व ताक़तें हमें बार बार पाकिस्तान के खिलाफ बोलने ,पाकिस्तान को गाली देने और पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाने पर क्यों मज़बूर करती हैं। अगर सरहद पर दोनों देशों की तरफ से गोलीबारी होती है और दोनों तरफ से जवान शहीद होते हैं ,आम नागरिकों का नुकसान होता है तो इसमें हम भारती मुसलमानों का किया कुसूर है? हमने तो पहले दिन ही पाकिस्तान को ठुकरा दिया था और भारत को ही अपना जन्म मृत्यु स्थान माना है,इस में हिंदुत्व ताक़तों के लिए संदेह की कोई जगह कहाँ से बचती है ? किया पकिस्तान में जो चंद हिंदू परिवार हैं अगर उनको वहां के लोग भारत मुर्दाबाद का नारा लगाने और भारत को गाली देने पर मज़बूर करे तो आप को अच्छा लगेगा??

हम भारत के मुसलमान भारत से दिल व जान से प्रेम करते थे ,करते हैं और करते रहेंगे।लेकिन जब आप हमसे बार बार पाकिस्तान को गाली देने की बात कह कर हमारा इम्तेहान लेने की कोशिश करते हैं तो फिर दिमाग में एक नया प्रश्न उठता है ,वो यह की आप कभी हमें नेपाल मुर्दाबाद का नारा लगाने को नहीं कहते,?नेपाल से भी तो आतंकवादी और माओवादी हमारे देश में आते हैं ,पाकिस्तान के अधिकतर आतंकवादी नेपाल के रास्ते ही आते हैं ,इसका मतलब यह है की नेपाल की सरकार हमारे देश में घुसने के लिए उनको रास्ता दे रही है,लेकिन कभी यह भगवाधारी ताक़तें हमसे नेपाल मुर्दाबाद के नारे लगाने को नहीं कहती ,किया सिर्फ इस लिए के वहां की अधिक आबादी हिंदू समुदाय से है ?

किया कारण है की कभी श्रीलंका के खिलाफ इन संघियों ने नारे नहीं लगाए और ना ही किसी भारती मुसलमान को श्रीलंका मुर्दाबाद कहने को कहा गया और ना ही वो खुद श्रीलंका के खिलाफ ज़हर उगलते नज़र आए ,जबकि हर दूसरे दिन श्रीलंका हमारे मछुवारों को पकड़ ले जाता है ,हमारे बोट को ज़ब्त कर लेता है। और वर्षों से हमारे मछुवारों को श्रीलंका की सरकार अपने जेल में बंद कर के उन पर अत्याचार कर रही है ,लेकिन फिर भी कभी श्रीलंका मुर्दाबाद का नारा लगवाने यह संघी लोग मुसलमानों की बस्ती में नहीं आते ,किया इसलिए नहीं आते ,की वहां मुसलमानों की संख्या कम है और हिन्दू अधिक हैं ? इन भगवाधारी संघियों को मुस्लिम बहुसंख्यक कसबे में जाते ही पाकिस्तान के खिलाफ गुस्सा फूटने लगता है ,लेकिन कभी चीन के खिलाफ ज़हर नहीं उगलते और ना ही मुसलमानों को चीन मुर्दाबाद कहने को कहा जाता,जबकि डोकलाम में चीन किया कर रहा है और चीनी सेना कैसे हमारी ज़मीन पर क़ब्ज़ा कर रहा है ,यह सब को मालूम है फिर भी इन तथाकथित देशभक्तों के मुंह से चीन के खिलाफ एक शब्द नहीं निकलता ,किया सिर्फ इस लिए की वहां मुस्लमान न के बराबर हैं ? और वहां की सरकार मुसलमानों पर जुल्म कर रही है  इसलिए????

हमें आपत्ति इस बात पर भी है की यह लोग म्यांमार,बांग्लादेश,अमेरिका ,इजराइल और अन्य देशों के खिलाफ ना ही यह खुद नारा लगते हैं और ना ही मुसलमानों की बस्ती में आकर नारा लगाने को कहते हैं। और ऐसा किया है पाकिस्तान में जिसके लिए यह चार आने के देशभक्त भारतीय मुसलमानों को कभी मस्जिद से निकल कर तो कभी मदरसे के बाहर और कभी मुसलमानों की बस्ती में जाकर पाकिस्तान के खिलाफ ज़हर उगलते हैं और मुसलमानों को भी पकिस्तान मुर्दाबाद का नारा लगाने पर मज़बूर करते हैं?और अगर हम नहीं लगते तो फिर हमारे साथ मारपीट की जाती है ,हमें गद्दार और देश विरोधी कहा जाता है और मीडिया में हमारे खिलाफ ट्रायल शुरू हो जाता है.

हम सुबह से शाम तक हिंदुस्तान ज़िंदाबाद का नारा लगाने को तैयार हैं और जब भी देश की बात आती है तो भारती मुसलमान सब से पहले हिंदुस्तान ज़िंदाबाद का नारा लगाता है ,लेकिन एक बड़ा प्रश्न यह है की हम दूसरे देश के लिए मुर्दाबाद का नारा क्यों लगाएं ? अगर थोड़ी देर के लिए हम यह मान भी लें की अगर हम हिन्दुस्तान ज़िनदंबाद का नारा लगाने से इंकार करते हैं तो हम देशविरोधी हैं ,लेकिन यह कैसे सही माना जा सकता है की दूसरे देश के लिए अगर हम मुर्दाबाद का नारा नहीं बोलेंगे तो देश के गद्दार हो जाएंगे?अगर पाकिस्तान नापाक कोशिशें करता है तो मुस्लमान कभी उसकी तारीफ़ नहीं करता ,और ना ही कभी करेगा। लेकिन अगर पाकिस्तान अपनी नापाक कोशिश में कामयाब हो जाता है तो फिर उसमे भारती मुसलमानों का क्या दोष है। इसमें तो सरकार की गलती है और देश का नेतृत्व करने वालों की नाकामी है तो क्यों न हम पहले अपनी सरकार के खिलाफ नारेबाजी कर लें ,फिर पाकिस्तान मुर्दाबाद का नारा लगाएं?

एक आम नागरिक होने के नाते जब आप सोचेंगे और पूरी ईमानदारी के साथ विचार करेंगे तो आप मालूम हो जाएगा की ऐसा पहले नहीं होता था की पकिस्तान मुर्दाबाद जबरदस्ती बुलवाया जाए और न बोलने वालों पर हमला किया जाए ,लेकिन जब से हिन्दू मुस्लिम के आधार पर सरकार बनी है तब से धर्म को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने वाले भगवाधारी संघी लोग यह कारोबार करने लगे हैं ,चूँकि उनको धर्म का चूरण खिला पीला दिया गया है जिसका नशा उतरने में काफी समय लग सकता है। यही कारण है की यह तथाकथित धार्मिक युवाओं की सेना किसी भी मुस्लिम बहुसंख्यक आबादी वाले इलाक़ में दस भगवा झंडे के साथ एक तिरंगा लेकर पहुँच जाती है और मस्जिद,मदरसों के सामने जय श्रीराम ,भारत माता की जय जयकार कर के माहौल खराब करते हैं ,और वहां के मुसलमानों को जय श्रीराम और भारत माता की जय कहने पर मज़बूर करते हैं ,फिर पकिस्तान को गाली देने के लिए दबाव बनाते हैं और जब कोई मुसलमान इस से कुछ भी इंकार करता है तो यह पूरी भीड़ उनकी जान लेने के लिए टूट पड़ती है ,और इस तरह धार्मिक हिंसा को हवा दे दी जाती है जिसका सीधा लाभ धर्म के लिबास में छिपे उन राजनेताओं और उन पार्टियों को होता है जो ऐसे असामाजिक तत्वों को अपनी रोटी के टुकड़ों पर पालते हैं।

समझने की बात यह है की मुसलमानों को सिर्फ पाकिस्तान मुर्दाबाद इस लिए कहने पर मज़बूर किया जाता है के कोई मुस्लिम व्यक्ति किसी भी तरह से सिर्फ नारा लगाने से इंकार कर दे. फिर सांप्रदायिक हिंसा को हवा दे कर अपनी रोटी सेंकी जाए ,इस लिए ऐसी भीड़ से सतर्क रहिए और होशियारी से काम लीजिये ,चूँकि असामाजिक तत्व को मालूम है की हम भारत माता की जय और वन्दे मातरम के साथ साथ पाकिस्तान के सहारे भी मुस्लिम बस्तियों में आग लगा सकते हैं और यही सब पिछले दिनों कासगंज में भी हुआ. इसलिए अपनी सूझबूझ का प्रदर्शन कीजिए. और उनकी चाल को समझने का प्रयास करें.

 

नोट : यह लेख़क के अपने विचार हैं.

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