राहुल-तेजस्वी के लंच पर इतना हंगामा है क्यों बरपा ?

0
14

मनीष कुमार

 

कांग्रेस पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने पिछले कुछ दिनों में दो निर्णय लिए. एक उन्होंने झारखंड में पार्टी की कमान एक ऐसे व्यक्ति डॉक्टर अजय कुमार के हाथ में दी जो कुछ साल पहले ही पार्टी में आए हैं. दूसरा राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू यादव के पुत्र और बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने साथ भोजन किया. लंच तेजस्वी के साथ किया गया और भुगतान राहुल गांधी ने किया, लेकिन यह भोजन और ख़ासकर इसकी तस्वीर कई लोगों को पच नहीं रही. विशेष रूप से लालू यादव के विरोधी और कांग्रेस के अन्दर के नेताओं और कार्यकर्ताओं को. भाजपा के नेताओं का कहना था कि जो राहुल गांधी लालू यादव के साथ मंच साझा करने से परहेज़ कर रहे थे, उन्हें तेजस्वी के साथ लंच करने में कोई गुरेज़ नहीं. लेकिन कांग्रेसियों का कहना है कि इस आलोचना में कोई दम नहीं क्योंकि वो ये निर्णय नहीं ले सकते या फ़रमान नहीं जारी कर सकते कि राहुल गांधी किसके साथ लंच या डिनर करें.

इस लंच से सबसे ज़्यादा ख़ुश अगर कोई है तो वो हैं राजद अध्यक्ष लालू यादव. महागठबंधन के समय जहां लालू नीतीश कुमार से तेजस्वी को राजनीतिक रूप से बढ़ाने की उम्‍मीद रखते थे और नीतीश ने एक ईमानदार सहयोगी की तरह तेजस्वी को आगे बढ़ाया भी. लेकिन राहुल के साथ भोज के बाद लालू यादव इसलिए प्रसन्‍न हैं कि गांधी परिवार ने तेजस्वी को वैसे ही उनका राजनीतिक वारिस मान लिया है जैसा कि उतर प्रदेश में अखिलेश यादव को. ना केवल बिहार में बल्कि पूरे देश में राहुल के साथ इस फ़ोटो के बाद तेजस्वी का राजनीतिक कद बढ़ा है.

लेकिन कांग्रेसियों की और खासकर पुराने विधायकों, सांसदों की असल परेशानी यह है कि जिस गांधी परिवार ने आजतक चाय बिस्कुट से अधिक के लायक उन्हें नहीं समझा उस गांधी परिवार के भविष्य राहुल गांधी ने आख़िर तेजस्वी को सीधे खाना खिलाने के लायक कैसे समझ लिया. यहां ये बात किसी से छिपी नहीं कि राहुल से ज़्यादा तेजस्वी ने जैसे फ़ोटो को ट्वीट कर पूरे प्रकरण को भुनाने की कोशिश की है वो भी कांग्रेसियों की परेशानी का कारण है. और ये वही राहुल गांधी हैं जिन्होंने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अपनी ही सरकार के अध्यादेश को फाड़ा था, जिसके लिए लालू यादव और उनका परिवार उन्हें पानी पी पी कर कोसता था. ये अध्यादेश लालू यादव को सज़ा होने पर उनकी सदस्यता बरक़रार रहे, इसलिए लाया जा रहा था. ख़ुद राहुल गांधी ने कई लोगों को यह बात बताई है कि लालू यादव उनसे नाराज़ रहते हैं. इसके बावजूद जो राहुल लालू यादव की रैली से दूर रहते हैं, उनका ये क़दम कई लोगों की समझ से परे है. ख़ासकर इस पृष्‍ठभूमि में कि तेजस्वी यादव ख़ुद भी भ्रष्टाचार के मामले में सीबीआई के अलावा प्रवर्तन निदेशालय की जांच झेल रहे हैं. किसी भी समय ये एजेंसियां उनके ख़िलाफ़ चार्जशीट दायर कर सकती हैं.

लेकिन कांग्रेस नेताओं का कहना है कि राहुल-तेजस्वी भोज का असर उल्टा भी हो सकता है. राहुल को सहयोगियों की क़द्र करने की कला मालूम है, लेकिन शायद उन्हें इस बात का आभास ना हो कि तेजस्वी या लालू गांधी परिवार के साथ अपनी इस नज़दीकी को आधार बनाकर बिहार के कांग्रेसियों की उपेक्षा कर सकते हैं. जैसे जब से नीतीश महागठबंधन से बाहर गए हैं तब से लालू बिहार कांग्रेस के नेताओं के सामने हमेशा ये बात कहते हैं कि वो किसी भी मामले का समाधान सोनिया गांधी से बात कर निकालेंगे. लालू ने बिहार के कुछ कांग्रेस विधायकों के लिए चि‍रकुट जैसे शब्द का इस्तेमाल किया था. वहीं तेजस्वी भी राहुल के साथ इस नज़दीकी को बिहार में अपने सहयोगियों को सम्मान ना देने का आधार बना सकते हैं. राजद के विधायक भी लालू यादव के दोनों बेटों तेजप्रताप और तेजस्वी यादव के बारे में ये बात खुलेआम कहते हैं कि राजनीतिक शिष्टाचार क्या होता है, इसके ज्ञान का नितांत अभाव आपको दोनों भाईयों में हर समय देखने को मिल सकता है.

वहीं कई नेता लंच के पीछे एक नये राहुल गांधी को पाते हैं जिन्हें अपने सहयोगियों की शक्ति और भविष्य की राजनीति में उनके महत्व के आधार पर संबंध मज़बूत करने के लिए अब चाय बिस्कुट से आगे जाने में कोई परहेज़ नहीं. राहुल को मालूम है कि केंद्र में भाजपा की मोदी सरकार से लड़ने में वो राजद और तेजस्वी जैसे सहयोगियों की उपेक्षा नहीं कर सकते. यही कारण है कि जब नीतीश कुमार महागठबंधन के आख़िरी हफ़्ते में उनके पास ये अपेक्षा लेकर गए कि जैसे राहुल ने मुख्यमंत्री पद के लिए उनके नाम पर मुहर लगायी थी, वैसे ही भ्रष्टाचार के मामले में आरोपी बनाए जाने पर तेजस्वी यादव के इस्तीफ़े पर भी अपनी सहमति देंगे. तब राहुल ने मौन रहना बेहतर समझा. नीतीश कुमार आज तक ये दावा करते हैं कि अगर राहुल ने साथ दे दिया होता तो सरकार बच जाती. लेकिन राहुल को इस बात का अंदाज़ा हो गया था, ख़ासकर राष्ट्रपति चुनाव में रामनाथ कोविंद के नाम के समर्थन के बाद कि भाजपा नेताओं के साथ वो अपनी सीधी लाइन स्थापित कर चुके हैं और बस एक बहाना ढूंढ रहे हैं. इसलिए राहुल ने मुलाक़ात की औपचारिकता से ज़्यादा कुछ नहीं कर नीतीश को जाने का जहां मौक़ा दिया लेकिन राजद के साथ अपने संबंधों में एक नया अध्याय शुरू किया.

हालांकि राहुल के क़रीबी मानते हैं कि अब भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उन्हें घेरने की कोशिश होगी. लेकिन उन्हें मालूम है कि न खाएंगे न खाने देंगे के नारे पर जो भाजपा सरकार सत्ता में आयी उसने अपने क़दमों से इस मुद्दे पर लोगों के बीच अपनी विश्‍वसनीयता खोई है. भाजपा सरकार की सत्ता के दौरान जिस सीबीआई ने भ्रष्टाचार के आरोप में तब तृणमूल नेता और अब भाजपा में शामिल मुकुल रॉय को चार्जशीट किया, उनको अपनी पार्टी में शामिल करा कर या महाराष्ट्र में नारायण राणे जैसे विवादास्पद नेता को एनडीए की सदस्यता देकर कम से कम अब भाजपा किसी को नसीहत नहीं दे सकती कि उसने भ्रष्टाचार से समझौता कर लिया. साथ ही जैसे ही आप भाजपा के साथ होते हैं, तब सारी जांच एजेंसी की जांच धीमी आंच के चूल्हे पर चली जाती है.

जहां तक नीतीश कुमार का सवाल है, तो उन्‍होंने जय शाह के मुद्दे पर जैसे मौन धारण किया या भ्रष्टाचार के आरोपियों को भाजपा में शामिल कराने पर अपनी कुर्सी के ख़ातिर आंख मूंदे रहे, तो अब उनके समर्थक भी मानते हैं कि इन सबके बाद भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उनके बोलने की कोई विश्‍वसनीयता नहीं रही. ख़ासकर बिहार में जैसे हर पंद्रह दिन में एक नए घोटाले का ख़ुलासा होता है, उससे सरकार के ऊपर हर दिन भ्रष्टाचार के छींटे पड़ रहे हैं. भले नीतीश ख़ुद साफ़ हैं और उनके विरोधी भी उनके ऊपर अंगुली नहीं उठाते हैं, लेकिन अगर उसी बिहार में घोटाले की साज़िश रचने वाले नीतीश कुमार के अपने कस्‍बे बख्तियारपुर में बनने वाले शौचालय के पैसों की भी बंदरबांट कर दें, तब आपको उनकी हिम्मत की दाद देने के अलावा सरकार के इक़बाल के बारे में सोचने पर मजबूर होना पड़ता है. लेकिन इसके लिए और वर्तमान स्थिति के लिए नीतीश ख़ुद भी ज़िम्मेवार हैं. वर्षों बाद इस साल बाढ़ में एक नहीं चार-चार जगह तटबंध टूटे, लेकिन उस विभाग के प्रधान सचिव को दुरुस्त करने की जगह उसकी तारीफों के पुल बांधने में नीतीश कुमार कोई कसर नहीं छोड़ते जो उनकी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ कथनी और करनी के फ़र्क़ को दर्शाता है.

इसलिए राहुल गांधी को मालूम है कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सभी मापदंड केवल उन्हीं के ऊपर नहीं लागू हो सकते. वो चाहे पार्टी हो या सहयोगी, वो किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार हैं. उनके लिए अब समय कम है और अपना संगठन अगर मज़बूत नहीं है तो फ़िलहाल सहयोगियों की बैसाखी के सहारे विरोधियों से फ़िलहाल उन्हें लड़ने में कोई परहेज़ नहीं. और जब बिहार में विधायक दल की टूट की ख़बर आयी तो हर विधायक से मिलकर उनकी बात सुनने में उन्‍हें कोई दिक़्क़त नहीं रही.

लेकिन कांग्रेसी कहते हैं कि गांधी परिवार के समर्थन और स्नेह के चलते अगर आप उनके विश्‍वास के साथ खेलने की कोशिश करेंगे तो उसका परिणाम भी भुगतने के लिए तैयार रहना पड़ेगा. इस सच का अनुभव पूर्व में लालू यादव कर चुके हैं और फ़िलहाल बिहार कांग्रेस पूर्व अध्यक्ष अशोक चौधरी को करना पड़ रहा है. लालू ने जब भी कांग्रेस पार्टी को अपनी शर्तों पर डिक्टेट करने की कोशिश की तो उसका ख़ामियाज़ा उन्हें भुगतना पड़ा है. जिस अशोक चौधरी का राहुल गांधी के समर्थन के कारण कोई कुछ बिगाड़ नहीं पाया, लेकिन एक बार राहुल गांधी को इस बात का शक हो गया कि अशोक विधायकों को तोड़ने में लगे हैं, तब से उनका राजनीतिक हश्र सब लोग देख सकते हैं. चाहे वो अजय कुमार की नियुक्ति हो या तेजस्वी यादव के साथ लंच, राहुल गांधी को राजनीति में आप नज़रंदाज नहीं कर सकते.

मनीष कुमार NDTV इंडिया में एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर हैं…

 

 

 

 

 

 

 

 

 

एनडीटीवी के सौजन्य से

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here