सरकारी नौकरियां और सरकारों का रवैया

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             इमरान इराक़ी

लेखक :इमरान इराक़ी

 

वक़्त के साथ-साथ मनुष्य के जीवन और उसकी सोच में भी बदलाव आता रहता है। फ़िलहाल मेरी सोच में जो एक नया बदलाव आया है वो ये है कि हमारे राजनेताओं के पास आरक्षण भी एक ऐसा हथियार है जिससे वो न सिर्फ अच्छा खेल खेल लेते है बल्कि कई बार तो पूरी बिसात ही उलट के रख देते हैं। यहाँ मैंने आरक्षण को “भी” में इस लिए वर्गीकृत किया है क्यूंकि मैं पहले यह समझता था की हमारे देश में सिर्फ धर्म को वह हैसियत हासिल है जिसकी बुनियाद पर कुछ भी किया जा सकता है। कुछ भी………. इस “कुछ भी” कि व्याख्या करने का मेरा फ़िलहाल बिल्कुल भी इरादा नहीं है। मै इसे आप की सोच पर छोड़ता हूँ जिसकी उड़ान आप चाहे जहाँ तक ले जाएँ।

फ़िलहाल रोज़गार और सरकारी नियुक्तियों से बात की शुरूवात करते हैं। देखा गया है कि देश में रोज़गार और सरकारी नौकरियों की स्थिति दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही है। नौजवान उच्च शिक्षा हासिल कर के भी बेरोज़गार नज़र आ रहे हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यार्थी अंथक कोशिशों के बाद भी नौकरियों से वंचित नज़र आते हैं। ज़्यादातर राज्यों में प्रतियोगी परीक्षाएँ करवाने वाले संस्थान सरकार की शह पर हाथ पर हाथ धरे बैठे नज़र आते हैं। कभी कभी 4/5 साल के अन्तराल में किसी परीक्षा का विज्ञापन आ भी जाय तो उसकी परीक्षा ही करवाने में तीन चार साल लगा देते हैं। परीक्षा हो जाए तो परिणाम घोषित करने में वर्षों लगते हैं इसके बाद भी यह प्रक्रिया पूरी नही हो पाती है। कई बार भ्रष्टाचार या किसी नियम उलंघन की वजह से मामला हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के चक्कर में फंस जाता है। ऐसे में अभ्यर्थियों को एक लम्बा इंतज़ार करना पड़ता है। देखा जाये तो सभी राज्यों में लगभग यही हाल है। इन राज्यों में बिहार और झारखण्ड की हालत कुछ ज़्यादा ही लचर है। चलिए इन्ही दो राज्यों की बात की जाये।

बिहार राज्य से अलग होकर झारखण्ड ने 15 नवम्बर 2000 को पृथक राज्य का दर्जा हासिल किया। झारखण्ड जिन बुनियादों पर बिहार से अलग हुआ था वह तमाम बुनियादें धराशाई हो गईं और समस्याएँ बदस्तूर जारी रहीं। स्थापना के सत्रह बरसों में पहली बार झारखण्ड में पिछले 3 बरसों से स्थाई सरकार है। झारखण्ड के निर्माण के समय यह तय किया गया था की राज्य में 15 वर्षों तक कोई गैर आदिवासी नेता मुख्य मंत्री की कुर्सी पर विराजमान नहीं होगा। और हुआ भी ऐसा ही लेकिन इस अंतराल में कभी भी सरकार की स्थिरता कायम नहीं रही। एक स्थिर सरकार नहीं होने के कारण झारखण्ड की अर्थवयवस्था बेहद लचर रही। सरकारी नौकरी और नौकरी के उम्मदीवार दोनों ही इस अरसे में निराश रहे। इस अरसे में ना तो बाहरी कंपनियों के लिए निवेश का उचित माहौल पैदा किया गया और ना ही सरकार बहादुर ने पूंजीपतियों का चोला उतार कर बेरोज़गार नौजवानों के हक़ में कोई ठोस कदम उठाया। जो दो-चार उठाये भी गये वो विवाद, केस, धरना प्रदर्शन और कोर्ट के फैसले के बाद सरकारी लचर वयवस्था की भेंट चढ़ गये। नतीजा प्राकृतिक संसाधनों से माला-माल होने के बावजूद झारखण्ड की पहचान एक पिछड़े राज्य की रही।

राज्य की निति वयवस्था पर भी बात कर लिया जाये। माना जाता है की किसी भी राज्य में सरकारी काम-काज के लिए प्रशासनिक अधिकारी रीढ़ की हड्डी होते हैं जिन का चयन विभिन्न लोक सेवा आयोग की कठिन परीक्षा से होता है। देखाजाए तो झारखण्ड इसमें भी अन्य राज्यो से चार कदम पीछे है। अपनी सत्रह वर्षीय जीवनकाल में झारखण्ड ने अभी तक मात्र 6 बार ही लोक सेवाओं की परीक्षा करवाई है। इन में भी परीक्षा करवाने वालाआयोगऔरपरीक्षा दोनों ही ज़्यादातर विवादों में घिरी रहीं। आप को याद दिलाता चलूँ की झारखण्ड लोक सेवा आयोग के द्वारा विभिन्न सेवाओं के लिए छठी संयुक्त असैनिक सेवा प्रतियोगिता परीक्षा की नोटिफिकेशन 2015 में आई थी। 2018 आ चूका है लेकिन नियुक्ति की प्रक्रिया अभी तक पूरी नहीं हुई है। इस से साफ़ पता चलता है कि सरकार बेरोज़गारों के लिए कितनी तेज़ी से काम करती है और कितनी चिंता व्यक्त कर रही है। इस संबंध में खबर है की झारखण्ड लोक सेवा आयोग ने प्रारंभिक परीक्षा में शामिल एस-टी, एस-सी और महिला वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए कट-ऑफ़-मार्क्स को कम करने का फैसला लिया है। अब इन वर्गों के अभ्यर्थियों को मुख्य परीक्षा में बैठने के लिए 32 प्रतिशत नंबर ही काफी होगा। साथ ही साथ सामान्य और पिछड़ा वर्ग के अभ्यर्थियों को भी कुछ रियायतें दी गई हैं।

निश्चित ही यह पहल सराहनीय है जिससे लाखों बेरोज़गारों को सरकारी नौकरियों में अपनी जगह बनाने के लिए ज़्यादा मौका मिलेगा। लेकिन इस के दूसरे पहलु से आप को अवगत करवाता हूँ। इसका दूसरा पहलु यह है की पहले जहाँ 326 सीटों के लिए मात्र 6 हज़ार अभ्यर्थी शामिल होते अब इस फैसले के बाद इतनी ही सीटों के लिए 34 हज़ार और उम्मीदवार मुख्य परीक्षा में ज़ोर आज़माई करेंगे। यहाँ मेरा इरादा बिलकुल भी यह नहीं की मैं इन 34 हज़ार उम्मीदवार को 6 हज़ार अभ्यर्थियों के लिए खतरा करार दूँ। और उनके मनोबल को हताश करूँ बल्कि यहां मेरा इस जानिब इशारा करना मकसद है की झारखण्ड लोक सेवा आयोग का यह फैसला ऐसा प्रतीत होता है जैसे भूखे प्यासे उम्मीदवार का एक गिरोह किसी सेठ के दरवाज़े पर हाथ फैलाये है और वह सेठ अपनी मूछों पर ताव दे कर रोटी का एक टुकड़ा उनकी तरफ फेंक दे। ज़ाहिर है ऐसी परिस्तिथि में सभी भूखे रोटी के उसी एक टुकड़े पर टूट पड़ेंगे। रोटी के इस एक टुकड़े से सभी का भला तो होने से रहा। मुझे समझ नहीं आ रहा है की जब सीटें सीमित हैं तो सिर्फ उम्मीदवारों की भीड़ बढ़ा के सरकार क्या साबित करना चाह रही है? 326 सीटों के लिए ज़ोर आज़माने वाले अभ्यर्थियों का कुछ यही हाल नज़र आ रहा है। इन्हें एक लम्बे इंतज़ार, अनिश्चित परिणाम, केस-मुकदमा, कोर्ट के फैसले के बाद एक और रिज़ल्ट के इंतज़ार में अपना कीमती वक़्त बरबाद करने के सिवा क्या मिल रहा है?

उच्च स्तरीय प्रशासनिक सेवाओं में नियुक्ति के अलावा झारखण्ड में उच्च स्तरीय शिक्षण संस्थानों में नियुक्ति का अमल भी सुस्ती का शिकार है। झारखण्ड की पांच यूनिवर्सिटी (इस के अलावा हाल ही में दो और की स्थापना हुई है ) में शिक्षकों और अशैक्षनिक कर्मचारियों की कमी के बावजूद राज्य सरकार ने अबतक सिर्फ एक बार 2006 में ही बहाली की है।(हालाँकि इसके पीछे भी एक लम्बी कहानी है ) इससे राज्य में उच्च स्तरीय शिक्षण के हाल का भी खूब अच्छी तरह से अंदाज़ा लगाया जा सकता है। पिछले 4/5 वर्षों से यूनिवर्सिटी में होने वाली जिन नियुक्तियों को पाइप-लाइन में बताया जा रहा था, एक लम्बे इंतज़ार के बाद 2016 में सिर्फ असोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर के पदों पर नियुक्ति का विज्ञापन आया । आज एक साल से अधिक समय गुज़रने के बाद भी ना तो उसके इंटरव्यू हुए और ना ही नियुक्ति का कोई अमल (सिवाय फॉर्म भरे जाने के) आगे बढ़ पाया है। उच्च शिक्षा प्राप्त बेरोज़गार नौजवानों को यहाँ भी निराशा ही हाथ लगी। क्यूंकि इन दोनों पदों के लिए बेरोज़गार नौजवान योग्य ही नहीं हैं। इन दोनों पदों के लिए योग्य उम्मीदवार तो वही होंगे जो पहले से इस विभाग में कार्यरत और अनुभवी हैं। असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए रिक्तियाँ होती तो ये नौजवान इसके योग्य ज़रूर होते लेकिन सरकार को तो इन्हें ठेके पर अनिश्चितता भरी नौकरी का तोहफा देना था, तो दिया भी।

हाल ही में कॉलेजों में संविदा पर असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति की प्रक्रिया खैर से पूरी कर ली गई है । लेकिन आप को बता दें की इस प्रक्रिया को पूरा करने में भी एक साल से ज़्यादा वक़्त लगा। ज़ाहिर है जब संविदा पर नियुक्ति करने में एक साल से ज़्यादा का वक़्त लग सकता है तो स्थाई नियुक्तियों की प्रिक्रिया में पांच दस साल तो लग ही सकते हैं।

सरकारी नौकरियों की बहाली का तंत्र इतना जटिल,भयावह,उकता देने वाला और हताश-व-निराश कर देने वाला होता जा रहा है की कई बार तो परीक्षा में कामयाब होने और लम्बे इंतज़ार के बाद नियुक्ति पत्र मिलने के बाद भी मामला अधर में लटक जाता है। कुछ न कुछ कारणों से मामला कोर्ट में पहुँच जाता है और कोर्ट नियुक्ति पर रोक लगा देती है।

अक्सर सरकार और कमीशन की मिली भगत से परीक्षा के मापदंड और पात्रता के विवरण में ऐसे लूप-होल्स होते हैं जिन की वजह से कोर्ट को इस पर रोक लगानी पड़ती है। लम्बे न्यायिक कार्यवाही के बाद कोई नतीजा निकल भी जाये तो सरकार न सिर्फ अपनी मनमानी करती है बल्कि कई बार जब हाई कोर्ट फटकार लगाती है तो सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुँच जाती है और जब सुर्प्रीम कोर्ट से भी फैसला उम्मीदवार के हक़ में आये तो भी अनैतिकता और गैर ज़िम्मेवार रवैये से नियुक्ति के अमल को ठन्डे बस्ते में डाल दिया जाता है। बेचारे उम्मीदवार इंतज़ार, इंतज़ार और इंतज़ार की स्पेशल ट्रेन में (जो खास अवसर पर चलाई जाती है) सफर करने को मजबूर होते हैं। स्पेशल ट्रेन का सफर फिर भी गनीमत जानिए की वो किसी रोज़ तो आप को मंज़िले मक़सूद(गंतव्य स्थान ) तक पहुंचा ही देगी।

सवाल यह भी अहम् है की जब सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर अमल न करने के कारण एक आम नागरिक न्यायालय की अवहेलना का दोषी करार दिया जाता है और उसके खिलाफ क़ानूनी करवाई भी की जाती है तो क्या राज्य और केंद्र सरकार का विभिन्न न्यायिक फैसलों को यूँही ठन्डे बस्ते में डाल कर अमल ना करना “न्यायालय की अवहेलना” की श्रेणी में नहीं आता ? या हम यह मान लें की जिस तरह आये दिन विभन्न चरमपंथी दल, विभिन्न संगठनें और खाप पंचायतें न्यायिक फैसलों की खिलाफवर्जी करती रहती है उसी डगर पर केंद्र और राज्य सरकारें भी चल रही हैं। सरकारें कैसे न्यायिक फैसलों पर अमल करने के बजाय टाल-मटोल करती हैं। इसकी ताज़ा मिसाल देखना हो तो बिहार की प्राइमरी से लेकर सीनियर सेकेंडरी तक के स्कूल शिक्षकों के साथ बिहार सरकार का रवैया देखें।

बिहार सरकार ने लगभग 4 लाख शिक्षकों को “नियोजित शिक्षक” के बतौर नियुक्त किया है। साल 2006 में 6 हज़ार के निम्न मासिक वेतन पर इनकी नियुक्ति हुई थी। फिर क्रमबद्ध नियोजित शिक्षकों की नियुक्ति होती रही। शिक्षकों के जबरदस्त विरोध के कारण अब इनका वेतन बढ़कर 20 से 22 हज़ार मासिक तक पहुँच गया है। लेकिन इनका विरोध अब भी जारी है। वह “समान काम समान वेतन” और नौकरी को नियमित करने की मांग कर रहे हैं। शिक्षकों के विभिन्न संघों ने पटना हाई कोर्ट में मुकदमा दायर कर रखा था। 8 से 10 साल के बाद हाल ही में पटना हाई कोर्ट ने विभिन्न मुकदमों की सुनवाई करते हुए इन शिक्षकों के हक़ में फैसला सुनाया। बिहार सरकार को आदेश जारी किया कि इन शिक्षकों को नियमित करते हुए उन्हें समान काम के बदले समान वेतनदिया जाये । लेकिन बिहार सरकार का रवैया देखिए। हाई कोर्ट के इस फैसले पर अमल करने के बजाय बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अर्ज़ी दायर कर दिया। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले ही संविदा पर काम करने वाले कर्मचारियों के मामले में “समान काम समान वेतन” का फैसला सुना रखा था। अब 20 से 22 हज़ार वेतन पर ज़िंदगी गुज़ारने वाले ये शिक्षक चंदा कर के किसी तरह महंगे से महंगे वकील के ज़रिये सुप्रीम कोर्ट में बिहार सरकार के खिलाफ मुकदमा लड़ने को विवश हैं।

आप में से अक्सर को याद होगा उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूलों की हालत सुधारने की दिशा में इलाहबाद हाई कोर्ट ने फरमान जारी किया था की तमाम सरकारी अधिकारियों के बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ेंगे लेकिन इस फरमान के बाद उच्च पदों पर विराजमान कितने अधिकारी अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेज रहे हैं। यह तो शायद ही किसी को मालूम होगा। देखा जाये तो ये भी न्यायिक फैसले के अपमान का मामला बनता है लेकिन उच्च पदों पर बैठे सरकारी अधिकारीयों पर न्यायिक अपमान का मुकदमा कौन करेगा ?

बिहार में 2014 में विश्वविद्यालयों और सम्बंधित महाविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति का विज्ञापन आया था, जिसकी बहाली की प्रक्रिया अबतक पूरी नहीं हुई है। कभी कोर्ट का मामला तो कभी मदरसा से पासआउट अभ्यर्थियों की डिग्रियों की समकक्षता की पुष्टि का मामला, कभी भ्रष्टाचार का मामला तो कभी पात्रता मापदंडो का विवाद, इन सब के बीच यह प्रक्रिया अबतक जारी है और खुदा जाने कब तक यह चलता रहेगा ।

केंद्र और ज़्यादातर राज्यों अब तो बी-जे-पी की ही सरकार है जो नौजवानों को नौकरी और रोज़गार के वादों के भरोसे सत्ता में आई थी लेकिन उनके वादों पर भरोसा करके पढ़े-लिखे नौजवान नौकरियों की आस में अबतक बेकार ही बैठे हैं। बल्कि रोज़गार और नौकरी के मसले पर हमारे प्रधान सेवक से सवाल किया जाता है तो पकोड़े बेच कर 200 रूपये दिहाड़ी कमाने को प्रधान सेवक रोज़गार बताते हैं। हालाँकि देश के विभिन्न भागों में सरकार द्वारा तय किया गया न्यूनतम दिहाड़ी मज़दूरी 400 , 450 से 550 तक है। एक तरफ सरकार ने निराश कर ही रखा है दूसरी तरफ देश में सब से ज़्यादा नौकरी देने वाला विभाग रेलवे भी नौजवानों को हताश करने के साथ वंचित करने का काम कर रहा है। रेलवे विभाग ने नियुक्ति के लिए उम्मीदवारों की अधिकतम आयु सीमा को 30 से घटा कर 28 वर्ष कर दिया है। मतलब बरसों से जो नौजवान नौकरी के इंतज़ार में रेलवे की तैयारी कर रहे थे वो अब अचानक से एक्सपायर हो गये हैं। इधर यु-पी-एस-सी ने भी साल-दर-साल अपने रिक्त-पदों में कमी करना शुरू कर दिया है। साल 2018 के लिए जारी विज्ञापन में रिक्त-पदों को देख कर अंदाज़ा होता है की 2012-14 के मुकाबले में यू-पी-एस-सी ने अपने रिक्त-पदों में लगभग 50 प्रतिशत की कमी कर दी है। मतलब अब यह मन लिया जाये की या तो देश के नौजवानों को नौकरियों की ज़रूरत ही नहीं है या फिर देश के 80 प्रतिशत नौजवान रोज़गार में हैं। फिर तो मुबारक हो कि आप पकोड़ै तलने के लिए तैयार हैं।

 

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