फूलपुर,गोरखपुर के उपचुनाव से BSP कर सकती है खुद को अलग !

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लखनऊ :उत्तर प्रदेश में फूलपुर और गोरखपुर के उपचुनाव को लोकसभा चुनाव से पहले जनता की नब्ज टटोलने का जरिया माना जा रहा है। राजनीति पार्टियां इसे रिहर्सल के तौर पर देख रही हैं। उप चुनाव का मैसेज पूरे देश में जाएगा ऐसे में सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ही शह-मात के खेल में जुटे हैं। कांग्रेस ने लोकसभा उप चुनाव के उम्मीदवार घोषित कर फुलपुर से मनीष मिश्रा और गोरखपुर से सुरहिता करीम को मैदान में उतारा है। यूपी की राजनीति में अहम किरदार निभाने वाली बहुजन समाज पार्टी के फैसले पर सब की निगाहें टिकी हैं। बसपा में मंथन का दौर जारी है। हालांकि अंदरखाने में बसपा ने अपने पत्ते तय कर लिए हैं।

जोर आजमाइश के चुनाव में बसपा दूर से नजारा देखने की तैयारी में है। मतलब फूलपुर उपचुनाव में अपना प्रत्याशी नहीं उतारेगी।अटकलें ये भी लगाई जा रही थी कि इस सीट से बीएसपी अध्यक्ष मायावती चुनाव लड़ सकती हैं. ये वही सीट है जहां से साल 1996 के लोकसभा चुनावों में बीएसपी के संस्थापक कांशीराम हार चुके हैं. कांशीराम को समाजवादी पार्टी उम्मीदवार जंग बहादुर पटेल ने 16 हजार वोटों से हराया था.पिछले 29 साल से गोरखपुर सीट से लगातार गोरक्षपीठ का दबदबा रहा है. साल 1989 में पीठ के महंत अवैद्यनाथ ने हिंदू महासभा की टिकट पर चुनाव लड़ा और 10 फीसदी वोट शेयर के अंतर से जनता दल के उम्मीदवार रामपाल सिंह को मात दी थी.

1991 और 1996 के चुनाव में अवैद्यनाथ ने बीजेपी की टिकट से जीत हासिल की थी. फिर 1998 से लगातार 2 दशक तक यानी अबतक इस सीट पर बीजेपी के टिकट पर योगी आदित्यनाथ काबिज हैं.वहीँ बसपा का एक मकसद लोकसभा से पहले पार्टी की समीक्षा होने से बचाना और दूसरा मतों का बिखराव रोकना है। इसके लिए एकजुट विपक्ष और गठबंधन की राजनीति को बल मिलेगा, जिसके जरिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजय रथ को रोका जा सके। वैसे भी फूलपुर संसदीय सीट गांधी परिवार की परंपरागत सीट रही है। यहां से प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू समेत दिग्गजों ने चुनाव लड़ा था। ऐसे में बसपा दूर से लड़ाई देखने की तैयारी में है। इसका तर्क बसपा के वरिष्ठ नेता ऐसे दे रहे हैं कि पार्टी ने कई बार उपचुनाव में हिस्सा नहीं लिया। ऐसा होने पर ऐसा पहली बार नहीं होगा।

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