जेएनयू की बर्बादी के पीछे कौन,छात्र,वीसी या कोई और…..??

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लेखक :रहमत कलीम

 

 

विश्व भर में अपनी अलग पहचान बनाने वाले भारत के प्रसिद्ध जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय को न जाने किस की नज़र लग गई के पिछले दो तीन वर्षों से अक्सर जेएनयू का कैंपस अखाड़े में बदल जाता है और वहां के छात्र क्लास छोड़ कर कभी कैंपस की सड़कों पर ,तो कभी देश की राजधानी के विभिन्न मार्गों पर प्रोटेस्ट करते नज़र आते हैं,ऐसे में यह प्रश्न उठता है की वहां अब पढ़ाई अधिक हो रही है या लड़ाई ,अगर आप पढ़ाई कहेंगे तो फिर आपको पिछले दो तीन वर्षों की समीक्षा करनी होगी जिसके बाद आप का यह उत्तर गलत साबित हो जाएगा ,लेकिन जब आप जवाब में ”लड़ाई ” कहेंगे तो एक दुसरा महत्वपूर्ण प्रश्न तेज़ी से उठ जाएगा की लड़ाई किस से है,किस के विरुद्ध है और किस के लिए है। इन तीन प्रश्नों का उत्तर तलाश करने से पूर्व यह बात आप को मान लेना चाहिए के जेएनयू को बर्बाद किया जा रहा है ,यह आप को तय करना है की इसे बर्बाद कौन कर रहा है ? क्या छात्रों की कोई लॉबी इस के पीछे है ,किया प्रशासनिक लॉबी है या कोई सरकारी मशीनरी इस के पीछे काम कर रही है।
में जेएनयू का छात्र रह चुका हूँ ,और मुझे याद है की मैंने वहां किस माहौल में अपना कोर्स पूरा किया है,सुबह से शाम या फिर रात के हर हिस्से में जेएनयू की सेंट्रल लाइब्रेरी में छात्रों की भीड़ आपको पढ़ती और रीसर्च करती नज़र आ जाती ,सड़कों पर छात्र अपने हाथों में पुस्तक लिए या कंधे पर बेग लटकाए हर समय लाइब्रेरी आते जाते दिखाई देते,खाने के लिए हॉस्टल के कैंटीन का टेबल हो या बाहर चाय के ढाबे ,हर जगह लोग एक दूसरे के साथ ज्ञान बांटते ,देश दुनिया की बड़ी बड़ी बातों पर बहस करते और छोटे बड़े हर समस्याओं पर विचार करते नज़र आ जाते। और वह ऐड ब्लॉक जहाँ शाम होते ही छात्र अपने लैपटॉप के साथ बैठ जाते और अपने पढ़ने लिखने का काम करना शुरू कर देते। मै ऐसे ही कैंपस से पढ़ कर आया था और मुझ से पहले जितने भी लोग वहां से ज्ञान की दौलत प्राप्त कर निकले सब को क़रीब क़रीब ऐसा ही वातावरण मिला,और यही वातावरण और हर तरफ से ज्ञान की हवा बहने की खूबी इस विश्वविद्यालय की पहचान थी ,लेकिन अब ना ही वैसा माहौल है और ना वह वातावरण ,न जाने किस की नज़र लग गई इस ज्ञानघर को।
जेएनयू के छात्रों की सब से बड़ी खूबी यह रही है की वो देश दुनिया में जहाँ भी अन्याय हो,उसके लिए वह सब से पहले आवाज़ उठाने वालों में से रहे हैं. यही कारण है की केंद्र में चाहे जिसकी भी सरकार रही हो ,जेएनयू के छात्रों से हमेशा नज़र में रखती रही है और उसे छेड़ने की कभी कोशिश नहीं की। लेकिन ऐसा लगता है की आज के केंद्र की सरकार को जेएनयू के छात्रों के जनुनु और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की अपार शक्ति का अंदाज़ा नहीं था. जेएनयू में आज से पहले कोई कन्हैया पैदा नहीं हुआ लेकिन जेएनयू का हर छात्र कन्हैया से कम नहीं है ,जेनएयू में कभी उमर खालिद ,शहला रशीद और अनिर्बान पैदा नहीं हुआ लेकिन वहां का हर विधार्थी कन्हैया ,शहला ,उमर खालिद और अनिर्बान ही है। इस लिए किसी को भी यह भ्रम नहीं होना चाहिए की इस कन्हैया ,शहला और उमर खालिद के बाद कोई दुसरा नहीं होगा।
अपने स्थापना से लेकर वर्ष 2015 तक बहुत ख़ामुशी के साथ जेएनयू ने ज्ञान की खुसबू फैलाए,कभी कोई इतना बड़ा हंगामा नहीं हुआ जो पिछले तीन चार वर्षों में हुआ.पहला सब से बड़ा डरामा अफ़ज़ल गुरु के नाम से शुरू हुआ ,हिंदुस्तान को टुकड़े टुकड़े करने के नारे ने इस डरामे को रफ़्तार दी और फिर कन्हैया ,उमर ,अनिर्बान की गिरफ्तारी और देशद्रोही के केस ने पुरे कैंपस को युद्ध स्थल में बदल दिया ,तब से आज तक संग्राम देखने को मिल रहा है ,देशद्रोही का जो मुक़दमा चला वो किस अंजाम को पहुंचा आपको मालूम ही होगा लेकिन जिन्होंने भारत को तोड़ने वाले नारे लगाए थे उन कश्मीरियों के साथ मोदी -महबूबा सरकार ने क्या कार्रवाई की इस से भी आप वाक़िफ़ होंगे। इस बड़े हंगामे के बाद से आज तक कोई न कोई ऐसी नई समस्या पैदा की जाती रही है या होती रही है जिसके कारण छात्र क्लास और लाइब्रेरी छोड़ कर कभी सड़कों पर तो कभी एडमिन ब्लॉक पर संघर्ष करने के लिए मज़बूर हुए हैं । अब तो एडमिन ब्लॉक का नाम भी छात्रों ने बदल कर फ्रीडम स्कवायर रख दिया है।

लेकिन बड़ा सवाल यह है की जेएनयू को बर्बाद कौन कर रहा है ,जेएनयू के खूबसूरत वातावरण का गला कौन घोंट रहा है। किया छात्र खुद अपने हाथों अपना घर उजाड़ रहे हैं। क्या चंद वर्षों के लिए यहाँ की प्रसाशनिक ज़िम्मेदारी संभालने वाले लोग इस को जान बुझ कर तबाह कर रहे हैं या इन प्रशासनों के सहारे सरकार इस संस्थान का खून करना चाहती है ? इन तमाम प्रश्नों के बीच एक बात जो सब से अहम है वो यह की जब से ममीदाला जगदीश कुमार को जेएनयू का कुलपति नियुक्त किया गया है तब से यहाँ का कैंपस अखाड़े में बदलना शुरू हुआ है।पहला मामला तो कन्हैया वाला था जिस के कारण कुलपति ने जेएनयू की पुरानी परंपरा को तोड़ते हुए पहली बार कैंपस के अंदर दिल्ली पुलिस को प्रवेश करने की अनुमति दे दी। और फिर उसके बाद से आज तक दिल्ली पुलिस के लिए कैंपस का मुख्य द्वार खोले रखा है ,अब तो हालत यह है की हर छोटी बात पर जेएनयू प्रशसन सीआरपीएफ की टीम कैंपस में उतार देती है। यह किसी भी यूनिवर्सिटी के लिए लाभदायक नहीं है ,प्रशासन को इस विषय में सोचना चाहिए।
जेएनयू में अभी जो कुलपति हैं उनके बारे में यह बातें पहले भी कही जाती रही हैं की वह भाजपा समर्थक हैं ,केंद्र सरकार का मुखौटा है और मानव संसाधन मंत्रालय की तरफ से बैठाया गया स्टंप मोहर। लेकिन मोहरा बनने वाले मिस्टर जगदीश को एक बार अकेले में यह सोचना चाहिए किया वह एक प्रशिद्ध संस्था को तबाह करने और हज़ारों छात्रों के करियर से मज़ाक़ करने पर खुश हैं। क्या उनका काम सिर्फ यही रह गया है की वह छात्रों के लिए कठिनाइयां पैदा करते रहें ,क्लास छोड़ कर सड़कों पर उतरने के लिए मज़बूर करते रहें। इन से पहले भी जेएनयू के कुलपति हुआ करते थे ,हमने उनको छात्रों के साथ ढाबे पर शान से चाय पीते देखा है ,छात्रों को अपने बच्चों जैसा सम्मान देते देखा है ,छात्रों के लिए सरकार से लड़ते देखा है ,लेकिन यह पहले कुलपति हैं जो सरकार के लिए या अपने अहंकार के लिए अपने ही छात्रों से लड़ रहे हैं , अपने ही छात्रों के लिए रास्ता मुश्किल कर रहे हैं और अपने ही छात्रों की जिंदगी से खेलवाड़ कर रहे हैं ,पिछले ढाई तीन वर्षों में इस कुलपति ने जेएनयू का जितना नुक़सान किया है ,इतिहास इनको कभी माफ़ नहीं करेगा। साथ ही साथ जगदीश कुमार को मोहरा बनाने वाली मोदी सरकार को भी जेएनयू की इतिहास में बहुत अच्छी तरह याद रखा जाएगा।जेएनयू ,जहाँ भाजपा आरएसएस की एक भी नहीं चलती ,जिसके कारण इस संस्था को बर्बाद करने की सरकार ने जो स्क्रिप्ट लिखी है उसके लिए शिक्षा का छेत्र कभी इनको माफ़ नहीं करेगा।
प्रतदिन कैंपस में आपको अब हंगामा देखने को मिलेगा ,छात्रों को आप प्रोटेस्ट करते कैंपस और कैंपस से बाहर हर दूसरे और तीसरे दिन देखंगे ,और यह सब केंद्र में एनडीए और कैंपस में जग्गू की सरकार आने के बाद से शुरू हुआ है। लेकिन इन तमाम बातों के बिच जेएनयू के छात्रों की हम्मत और साहस की दाद देनी होगी ,जो हर रोज़ नए तूफ़ान का मुक़ाबला उसी नई ऊर्जा के साथ करते हैं जिसके लिए वो जाने जाते हैं.लेकिन फिर भी न मोदी सरकार और ना जग्गू सरकार को यह समझ में आ रहा है की ये बच्चे थकने वाले नहीं है। और हो भी कैसे ,यहाँ जब कभी नई लड़ाई के लिए छात्र मैदान में उतरते हैं तो उनका यही नारा होता है ”अभी तो यह अंगड़ाई है ,और सिर्फ अंगड़ाई से ही केंद्र और कैंपस की सरकार को घुटने टेकने पर मज़बूर कर देते हैं। ना जाने आगे की लड़ाई के सामने यह सरकार कैसे टिक पाएगी।अपने अधिकार के लिए संघी सरकार के सामने डेट रहने और संघर्ष करने वाले समस्त छात्र एंव छात्राओं को लाल सलाम।

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