क्या तेज़ी के साथ हो रहा है कांग्रेस मुक्त भारत ?

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बेंगलुरु : कर्नाटक विधानसभा चुनाव के लिए मतगणना जारी है. वैसे, चुनाव बाद सर्वेक्षणों में राज्य में त्रिशंकु विधानसभा का पूर्वानुमान व्यक्त किया गया है. कर्नाटक में 12 मई (शनिवार) को 222 सीटों पर मतदान हुआ था. चुनाव कार्यालय के मुताबिक मतगणना लगभग 40 केंद्रों पर सुबह 8 बजे शुरू हुई. चुनाव परिणाम देर शाम तक स्पष्ट होंगे.

कर्नाटक विधानसभा में अगर कांग्रेस की जीत होती है तो संभावना यहीं जताई जा रही है कि सिद्धारमैया ही मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं. अगर सत्ता BJP के पाले में जाती है तो बीएस येदियुरप्पा ही मुख्यमंत्री बनेंगे. चुनाव के नतीजों को लेकर कांग्रेस और बीजेपी दोनों पार्टियां अपनी-अपनी जीत की बात कह रही हैं. लेकिन तय माना जा रहा है कि पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा का जनता दल (एस) ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभा सकता है.और ऐसा भी संभव है की ऐसी आवश्यकता न पड़े चूँकि अभी तक भाजपा के पास 120 से अधिक सीटों पर बढ़त है और अगर यही रहा तो फिर अकेले ही भाजपा सरकार बनाने में सफल हो जाएगी .

अगर रुझान नतीजों में बदलते हैं तो फिर भाजपा की चांदी ही चांदी है और अब कांग्रेस सिर्फ तीन राज्यों तक सिमटकर रह जाएगी।अब ऐसे में बड़ा सवाल यह है की किया अमित शाह का कांग्रेस मुक्त भारत बनाने का सपना साकार होता दिखाई दे रहा है। चूँकि अब सिर्फ भारत की ढाई फीसद जनता पर कांग्रेस का राज है ,और कई छेत्रिये दल कांग्रेस से आगे हो गई है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं हो गए की भारत तेज़ी के साथ कांग्रेस मुक्त हो रहा है।
कर्नाटक में पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले कांग्रेस इस बार करीब आधी सीटों पर सिमटती दिख रही है।
बता दें की बीजेपी के लिए कर्नाटक में आना 2019 के लिहाज से भी काफी अहम माना जा रहा है. दक्षिण भारत में इसे बीजेपी की शुरुआत कहा जा रहा है तो कांग्रेस के लिए आने वाले दिनों में चुनौती और बड़ी होने जा रही है. आइए जानते हैं कि कांग्रेस की इस हार की क्या पांच बड़ी वजहें रहीं.

हार के मुख्य कारण
कर्नाटक को राज्य में एंटी इन्कमबेसी फैक्टर का सामना करना पड़ा. सीएम सिद्धारमैया के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार इंदिरा कैंटीन जैसी योजनाओं के बावजूद लोगों को लुभाने में नाकाम रही. कांग्रेस और बीजेपी दोनों के मैनिफेस्टो में महिलाओं को आरक्षण, युवाओं को शिक्षा और रोजगार के भरोसे जैसे तमाम वादे लगभग एक जैसे ही थे. हालांकि, बीजेपी ने कांग्रेस के शासनकाल में भ्रष्टाचार और केंद्र की योजनाओं और फंड को लागू न करने जैसे मामलों पर राज्य की सरकार को घेरने का काम किया और इसमें सफल भी हुई.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन चुनावों में बीजेपी की ओर से प्रचार की कमान संभाली. इस दौरान पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने उनका कदम-दर-कदम साथ दिया. मोदी अपने प्रचार में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से लेकर सीएम सिद्धारमैया से जुबानी जंग में अकेले लोहा लेते दिखाई पड़े. कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी ने जमकर कैम्पेनिंग की, लेकिन पीएम मोदी अपनी कैबिनेट के मंत्रियों, कई राज्यों के सीएम के साथ चुनाव प्रचार में उतरे और लोगों को अपने वादों पर भरोसा करवाने में सफल रहे.

पारंपरिक रूप से दलित वोटर्स को कांग्रेस के साथ माना जाता है. इन चुनावों में बहुजन समाज पार्टी का जेडीएस के साथ मिलकर चुनाव लड़ना भी कांग्रेस के लिए नुकसानदायक रहा. इसके अलावा कांग्रेस को सेक्युलर वोट के बंटवारे का भी नुकसान उठाना पड़ा. बीजेपी से मुकाबले के नाम पर ये वोटर्स कांग्रेस, एनसीपी और जेडीएस में बंट गए. बहुजन समाज पार्टी और एनसीपी 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए गैर बीजेपी, गैर कांग्रेसी थर्ड फ्रंट बनाने के लिए कांग्रेस से छिटक रही हैं, यही चीज कांग्रेस को भारी पड़ा.

कर्नाटक चुनावों में कांग्रेस में खेमेबाजी भी देखने को मिली. पार्टी में सीएम सिद्धारमैया को खुली छूट देने का विरोध कांग्रेस के कई नेताओं ने छुपे तौर पर किया. टिकट बंटवारे में भी सिद्धारमैया की ही चली. आने वाले दिनों में पार्टी की हार की एक वजह टिकट बंटवारे में भी तलाशी जाएगी. कई जगहों पर एनएसयूआई और यूथ कांग्रेस के युवा नेताओं को टिकट मिले तो कई बड़ी सीटों पर कांग्रेस ने जिला और ब्लॉक स्तर के नेताओं को टिकट दिए.

कांग्रेस ने चुनावों से ठीक पहले लिंगायत वोटरों को लुभाने के लिए इसे अलग धर्म की मान्यता देने का कार्ड चला था. बीजेपी ने इसे समाज तोड़ने वाला कदम बताया था. राज्य की करीब 76 सीटों पर दखल रखने वाले लिंगायत समुदाय को लुभाने की यह कोशिश कांग्रेस को भारी पड़ी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, बीजेपी अध्यक्ष अमित साह समेत बीजेपी के दूसरे नेता मतदाताओं को यह समझाने में सफल रहे कि कांग्रेस का यह कदम हिंदू धर्म को बांटने वाला और समाज को तोड़ने वाला है.

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