नहीं खत्म होगी लालू की राजनीति!

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अजित द्विवेदी

 

चारा घोटाले से जुड़े दूसरे मामले में आए फैसले के बाद बहुत से लोग लालू प्रसाद के अंत की घोषणा करने लगे हैं। उनके लिए शोक गीत लिखा जाने लगा है और जनता दल यू के राष्ट्रीय महासचिव ने एक अध्याय समाप्त होने का ऐलान कर दिया है। पर क्या सचमुच लालू प्रसाद की राजनीति खत्म हो गई है? इस सवाल का जवाब बहुत आसान नहीं है। उनके बारे में इस किस्म की भविष्यवाणी 2005 में नीतीश कुमार के सत्ता में आने के समय भी की गई थी। पर दस साल के बाद लालू प्रसाद ने शानदार वापसी की। वैसे भी राजनीति में कभी किसी के अंत की घोषणा नहीं करनी चाहिए। हिमाचल प्रदेश में पंडित सुखराम और उनके बेटे अनिल शर्मा की सत्ता में वापसी इसकी सिर्फ एक छोटी सी मिसाल है।

पर लालू प्रसाद की राजनीति सुखराम या अनिल शर्मा की तरह सिर्फ एक व्यक्ति की राजनीति नहीं है, बल्कि यह उनकी राजनीति के कई आयामों से में एक आयाम है। यह सही है कि लालू प्रसाद की राजनीति में व्यक्तिवाद एक अहम तत्व है। भारत की मौजूदा राजनीति की तमाम बुराइयां उनकी राजनीति में भी है। उन्होंने निजी फायदे के लिए राजनीति और उससे मिली सत्ता का इस्तेमाल किया और वंशवाद को भी बढ़ावा दिया। उनकी कमान में मंडल की जिस राजनीति को फलने फूलने का अवसर मिला, उन्होंने उस अवसर को सीमित कर दिया। वे न तो इस आंदोलन का विस्तार देश के दूसरे हिस्सों में कर सके और न मंडल के आंदोलन के लक्ष्य को बिहार में हासिल कर सके। फिर भी यह हकीकत है कि व्यक्तिवादी और परिवारवादी राजनीति से अलग लालू की राजनीति का एक बड़ा सामाजिक आयाम भी था। अगर उनकी राजनीति खत्म होती है तो उसके साथ साथ एक सामाजिक आंदोलन बिना अपना लक्ष्य हासिल किए, असमय ही खत्म हो जाएगा।

एचडी देवगौड़ा, लालू प्रसाद और मुलायम सिंह को मंडल राजनीति का प्रतिनिधि चेहरा माना जा सकता है। जिस मंडल ने वीपी सिंह के हाथ से सत्ता छीनी थी, उसी ने देवगौड़ा को देश की सत्ता दिलाई थी। प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने वाले देवगौड़ा पहले पिछड़ा नेता थे और यह किसी चमत्कार से कम नहीं था। पर उनमें लालू प्रसाद जैसा करिश्मा नहीं था इसलिए वे इस सत्ता को ज्यादा समय तक बचाए नहीं रह सके। यह भी कहा जा सकता है कि वह समय राष्ट्रीय स्तर पर पिछड़ी जाति के राजनीति को स्थापित करने के लिए पर्याप्त रूप से अनुकूल नहीं था। मंडल की उस राजनीति को लालू प्रसाद ने बिहार में और मुलायम सिंह ने उत्तर प्रदेश में बेहतर ढंग से स्थापित किया।

नीतीश कुमार आज भाजपा की मदद से बिहार के मुख्यमंत्री हैं, वे भी इस हकीकत से इनकार नहीं कर सकते कि उनको मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने में जिस राजनीति ने उनका साथ दिया, उसके बीच लालू प्रसाद ने बोए थे। लालू से पहले कर्पूरी ठाकुर भी एक करिश्माई मुख्यमंत्री बिहार में हुए थे। वे भी पिछड़ी जाति से आते थे। पर वे जो नहीं कर पाए वह लालू प्रसाद ने कर दिया। लालू ने बिहार में पिछड़ा राज सुनिश्चित कर दिया। पिछले 28 साल की राजनीति इसकी मिसाल है। अपनी तमाम गढ़ी गई छवियों के बावजूद नीतीश कुमार अंततः लालू प्रसाद की प्रतिछाया हैं। आगे भी लालू प्रसाद की अच्छी या बुरी प्रतिलिपियों का ही बिहार में शासन होना है।

बिहार में मंडल का राज स्थायी बनाने में दो चीजों का बराबर योगदान रहा। पहली चीज लालू ब्रांड की राजनीति थी और दूसरी बिहार की जातीय संरचना। लालू प्रसाद ने इसको ध्यान में रखते हुए राजनीति की। उनको इसकी संभावनाओं का अंदाजा था। तभी जिस तरह उन्होंने इस सामाजिक संरचना का फायदा 1995 या सन 2000 में उठाया था, उसी अंदाज में 2015 में भी उठाया। 2015 का चुनाव नतीजा एक तरह से 1995 के नतीजे का दोहराव था। इससे यह भी जाहिर हुआ कि साल जितने भी बीत जाएं बिहार की राजनीति का मूल सिद्धांत नहीं बदलने वाला है। जाति वहां की राजनीति का मूल तत्व है और आगे भी रहेगा और इसी वजह से .यह मानने में कोई हिचक नहीं है कि लालू प्रसाद के अंत की घोषणा करने वाले लोग गलत साबित हो सकते हैं।

लालू प्रसाद ने अपनी राजनीतिक विरासत हस्तांतरित कर दी है। उनके बेटे तेजस्वी और तेज प्रताप और बेटी मीसा भारती उनकी राजनीतिक विरासत संभाल रहे हैं। दूसरी ओर नीतीश कुमार ने अपनी राजनीतिक विरासत ट्रांसफर नहीं की है। वे कर भी नहीं सकते हैं क्योंकि उनकी राजनीति लालू प्रसाद के मुकाबले ज्यादा व्यक्ति केंद्रित रही है। उन्होंने लालू प्रसाद की तरह पिछड़ों का मसीहा बनने की बजाय सुशासन को अपनी राजनीति का मूल तत्व बनाया। उन्होंने ईमानदार, कर्मठ और योग्य मुख्यमंत्री की अपनी छवि गढ़ी और उसे मजबूत किया। यह छवि उनके साथ ही चली जाएगी और उसके बाद उनकी पार्टी के पास कोई आधार नहीं बनेगा। उनकी पार्टी जनता दल यू की एकमात्र पूंजी नीतीश खुद हैं, जबकि राजद की पूंजी अकेले लालू नहीं है। यह फर्क आगे की राजनीति में दिखाई देगा।

लालू प्रसाद की राजनीति का आधार जातियों का गठबंधन रहा है। यादव और मुस्लिम उनकी राजनीति के आधार हैं और उनके जेल में होने या रिटायर हो जाने पर भी उनकी पार्टी को नहीं छोड़ने वाले हैं। इसलिए लालू को चाहे चारा घोटाले के सभी छह मामलों में सजा हो जाए, उनकी अपील बनी रहेगी और उनकी पार्टी का आधार बना रहेगा। सीटों की संख्या कम या ज्यादा हो सकती है पर उनकी पार्टी और उनकी राजनीति खत्म नहीं होने वाली है। बेशक नारा भर ही है पर सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता के लिए प्रतिबद्धता की घोषणा लालू प्रसाद की पार्टी को खत्म नहीं होने देगी।

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