मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग ने पाकिस्तान को विदेश की सूची से किया बाहर ………..

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भारत के कुछ शैक्षणिक संस्थानों में अल्पसंख्यक समुदायों को आरक्षण तो मिल सकता है लेकिन क्या इसी आधार पर सरकारी नौकरियों में भी आरक्षण का लाभ मिल सकता है? अगर नहीं तो फिर सरकारी नौकरियों के विज्ञापित पदों के लिए निकाली जाने वाली रिक्तियों में धर्म का कॉलम देना किन तर्कों की बुनियाद पर सही ठहराया जा सकता है ? सवाल यह है कि क्या यह धर्म के आधार पर भेद-भाव करने की प्रवृत्ति का पहला कदम नहीं है ? जबकि हमारा संविधान कहता है “जाति, धर्म, भाषा और किसी भी तरह की साम्प्रदायिक विचार की बुनियाद पर भेद-भाव नहीं किया जाना चाहिए” हालाँकि इसके बाद भी हमारा संविधान सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए सकारात्मक कार्यों की इजाज़त देता है। लेकिन इसके लिए पहले यह ज़रूरी है की ऐसे वर्गों की पहचान की जाए जो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हों। “मंडल कमीशन” ने इसी की पहचान ओबीसी के तौर पर की थी जिन्हे शिक्षा और नौकरी दोनों में 27% आरक्षण का लाभ की सिफारिश की । लेकिन ख्याल रहे कि ओबीसी के अंतर्गत आने वाले ऐसे वर्गों का सम्बन्ध धर्म से पहले सीधे तौर पर सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों से होता है, ना की धर्म से।

ऐसे में क्या यह माना जाए कि, यह सिर्फ इस लिए है कि धर्म के आधार पर उम्मीदवारी का फैसला करने में मसनद नशीनों के लिए आसानी पैदा हो ? या इस लिए कि “धर्म के आधार पर कुछ भी किया जा सकता है” का तार्किक मर्म धरातल पर उतारा जा सके ? यह सवाल ऐसे वक़्त में और भी ज़्यादा प्रासंगिक हो जाता है जब पूरी आरक्षण प्रणाली ही कटघरे में खड़ी दिख रही हो और इस पर सियासी रोटियां सेंकने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग अपने-अपने तर्क दे रहे हों। दरअसल आज इन बातों का सीधा सम्बन्ध मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग के द्वारा बैकलॉग, पदोन्नति/सेवा निवृत्ति और नवीन सृजित पदों के लिए निकाले गए सहायक प्राध्यापक की विज्ञप्ति से है।

विज्ञापन के संदर्भ में बात की जाए तो खास तौर से प्रदेश के बाहर के अभ्यर्थियों के बीच इस विज्ञापन को लेकर पहले रोज़ से ही रोष देखने को मिल रहा था। जिसे बाद में अधिकतम उम्र सीमा में बढ़ोतरी कर शांत किया गया। मामला यह है की जहाँ इन विज्ञापित पदों के लिए राज्य के अभ्यर्थियों की अधिकतम उम्र सीमा 40 वर्ष रखी गई थी वहीँ राज्य से बाहर के अभ्यर्थियों के लिए यह सीमा सिर्फ 28 वर्ष रखी गई। सवाल है की क्या 28 वर्ष की आयु में नेट के साथ पीएचडी की उपाधि भी अर्जित की जा सकती है ? जवाब “हाँ” में भी यक़ीनन हो सकता है, लेकिन यहाँ अहम और बड़ा सवाल यह है की उनका प्रतिशत कितना होगा ? ऐसे में क्या यह ना माना जाए कि सरकार बेरोज़गारी के स्तर, वेकेंसीज की कमी और रिक्त पदों के मुकाबले कम सीटों की स्थिति को भली-भांति समझते हुए यह सिर्फ भीड़ को छांटने और बाहरी अभ्यर्थियों को दूर रखने की एक रणनीति है ? ज़ाहिर है ऐसे में दूसरे राज्यों के विद्यार्थी इन विज्ञापित पदों के लिए अपनी दावेदारी ठोकने से वंचित ही रह जायेंगे।

हालाँकि राज्य के पास यह हक़ है कि वो अपने राज्य के अभ्यर्थियों को प्राथमिकता दे, लेकिन ऐसे नियम बनाना जिसे पूरा कर पाना ही बहुसंख्यक विद्यार्थियों के लिए नामुमकिन हो, उनका मज़ाक बनाने जैसा नहीं है ? हालाँकि बाद में लोक सेवा आयोग ने शुद्धिपत्र के ज़रिये ना सिर्फ अधिकतम उम्र सीमा (44) में बढ़ोतरी कर दी बल्कि अंतिम तिथि (10.05.2018) को भी और आगे बढ़ा दिया। जिसके बाद प्रदेश से बाहर के राज्यों के अभ्यर्थी भी इन पदों के लिए अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं।

दूसरी तरफ, पीएचडी की उपाधि इस लिए कि सिर्फ नेट की पात्रता से आज कल कुछ नहीं होता। ऐसे हज़ारों और लाखों की संख्या में छात्र भटक रहे हैं जिन्होंने नेट की पात्रता पूरी किये 10 से 15 साल का एक लम्बा अर्सा माथे पर बेरोज़गारी का लेबल लिए गुज़ार लिया है। कई विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में तो सिर्फ नेट की पात्रता पर अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के योग्य भी नहीं समझा जाता। इसके बाद भी लेख प्रकाशनों और पुस्तक लेखन का एक ऐसा अंबार सजाया जाता है, जिसकी सजावट के आगे डिग्रियों की टिमटिमाती रौशनी को ग्रहण लगा दिया जाता है। (हालाँकि यह प्रक्रिया पारदर्शिता पर आधारित है, इसके परे भी एक दुनिया आबाद है……… )

सब से अहम जो मामला प्रकाश में आया है वह मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग के (सहायक प्राध्यापक) ऑनलाइन फॉर्म का है। ऑनलाइन फार्म में कई ऐसे कॉलम हैं जिनकी उपयुक्ता समझ से परे की चीज मालूम होती है। इसके अलावा फॉर्म्स की जटिलता ऐसी मानो यूपीएससी की परीक्षा दे रहे हों। अगर आप एक बैठक में फॉर्म भरने की सोच रहे हैं तो……. तो “ख्याल अच्छा है”…… । फॉर्म की शुरुआत आवेदक के नाम के साथ ही धर्म से हो जाता है, फिर “आवेदक की राष्ट्रीयता” और फिर “क्या आवेदक भारत का नागरिक है?” जैसे एक ही सवाल को घुमा-फिरा के पूछा गया है।

MPPSC (Assistant professor

अच्छा मुझे आज तक यह नहीं समझ आया की नौकरी से विवाहित होने का क्या सम्बन्ध है ? क्या सरकार विवाहित होने के आधार पर वेतन तय करेगी ? या ससुराल वाले क्षेत्र में पोस्टिंग कर देगी ? खैर ! दिलचस्प तो यह है की आप से सिर्फ विवाहित होने की बात ना पूछी जाये बल्कि विवाह करने की तिथि भी पूछ ली जाये। सवाल यहीं ख़त्म नहीं हो जाते बल्कि “क्या आवेदक विधवा/तलाकशुदा/परित्यक्ता महिला है, क्या आवेदक की एक से अधिक जीवित पत्नियां है, जीवित बच्चों की संख्या, अंतिम बच्चे की जन्म तिथि, क्या अंतिम बच्चे जुड़वाँ हैं, पत्नी का जन्म स्थान और राष्ट्रीयता जैसे सवाल भी पूछ लिए जाते हैं।

चलिए राष्ट्रीयता की बात तो समझ में भी आती है लेकिन यह क्या सवाल है की आप से आप के मूलतः निवास स्थान के दो ऐसे References के नाम पूछे जाएँ जो आप को जानते हैं। भला उनके जानने और ना जानने से क्या फर्क पड़ जायेगा ? और अगर मैं यह कहूं की मैं अपने निवास स्थान पर बहुत ही अलग-थलग रहने वाला आदमी हूँ जिसकी किसी से कोई जान पहचान नहीं, तो क्या मै इस विज्ञप्ति के योग्य नहीं हूँ ? यह कैसा तर्क है ?

फॉर्म में आगे जो पूछा गया है उससे वर्तमान भारत की राजनीती और उसके केन्द्रीकरण के असर में आये विभिन्न राज्यों के विभिन्न विभागों की स्थिति का बखूबी अंदाज़ा लगाया जा सकता है। कॉलम में पूछा गया है की “यदि आवेदक मूलतः पाकिस्तान का निवासी है तो उस देश में पता तथा भारतीय संघ में प्रवर्जन की तारीख” क्या है। यह सवाल अपने आप में इतना अहम नहीं जितना इस सवाल “क्या आवेदक भारत का नागरिक है” के पूछे जाने के बाद हो जाता है। जब आवेदक से उसकी राष्ट्रीयता के सम्बन्ध में पहले ही पूछ लिया गया है तो यह सवाल आप की किस मानसिकता को दर्शा रहा है ?

मानसिकता का स्तर तो उस वक़्त और भी ज़्यादा शून्य पर मालूम होता है जब आप “निवास अवधियों सहित उन स्थानों के ब्योरे, जहाँ आवेदक पिछले पांच वर्षों के दौरान एक वर्ष से अधिक समय तक रहे हों ? यदि विदेश (जिसमे पाकिस्तान भी शामिल है) में रहे हों, तो उन सभी स्थान के ब्योरे दिये जाने चाहिए जहाँ आप 21 वर्ष की आयु के बाद एक वर्ष से अधिक समय तक रहे हों”…….यह सवाल भी अपने आप में इतना अहम नहीं जितना की सवाल के गर्भ में पाकिस्तान को संजो देने के बाद हो जाता है। मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग के पास क्या कोई खास मानचित्र है जिसके अनुसार पाकिस्तान विदेशी वर्ग में नहीं आता ? सवाल यह है की ऐसी कौन सी मानसिकता काम कर रही है जो MPPSC को पाकिस्तान के नाम को अलग से लिखने की ज़रूरत आन पड़ी ? या यह मान लिया जाए कि मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग को पाकिस्तान से कुछ ज़्यादा ही प्रेम है ? वैसे प्रेम को जबतक दिल तक सिमित रखा जाए तो अच्छा है वरना गर्भ में पलने के बाद दुनिया को जवाब देना पड़ता है।

इनसब के बाद MPPSC (सहायक प्राध्यापक) ने अभ्यर्थियों पर बेरोज़गारी में पोर्टल शुल्क के साथ-साथ GST का बोझ दे कर दिल में दर्द तो पैदा कर ही दिया। अब भला इस दर्द के साथ प्रेम की कहाँ जगह बचती है।

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