मीडिया और जनमानस :  बड़े समाचार समूह बनाम छोटे एवं स्वतंत्र समूह

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Media aur Janmanas
          Zubair Alam

क्या यह तभी संभव हो पाया है कि व्यवस्था में मौजूद अनियमितता को आम जन मानस तक लाया जा सके। जब विभिन्न किस्म के छोटे एवं स्वतंत्र समाचार पोर्टल तथा एजेंसियों का उदय हुआ? यह बात भी सच है कि पूँजी के एतबार से, सामर्थ्य के एतबार से और परिवेश के एतबार से बड़े समाचार समूहों के सामने इनकी कोई हैसियत नही है।

हमने तो जिस दिन से होश सँभाला है यही देखा है कि व्यवस्था के साथ चलने वाले, सामर्थ्यवान एवं आधुनिक औज़ारों से सुसज्जित संगठन ऐसा करने में आम तौर पर असफल रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है की व्यवस्था के साथ जाने में सफलता हाथ आये या नहीं आये, कम से कम विफलता और जवाबदेही से ज़रूर मुक्ति हासिल रही है। दूसरे शब्दों में कहें तो समाचार पहुंचाने का कार्यक्रम भी चलता रहा है और पत्रकारिता के नियम एवं पत्रकार होने के नाते समाज के प्रति दायित्व का निर्वहन भी कुशल रूप से होता रहा है।

उपरोक्त बातें सुनने में तो बड़ी मनभावन लगती हैं लेकिन इसमे सच्चाई भी है क्या? हमें लगता है की सच्चाई इसके विपरीत दिशा में मौजूद है। मिसाल के तौर पर कहा जाता है की पत्रकार को दिये गये संदर्भ/ सूचना को परखना चाहिये और जब वह हक़ीक़त को जान और समझ ले तथा अपने को संतुष्ट अवस्था में पाये तो समाचार (content) को पाठको के समझ आवश्यक व्याख्या के साथ पेश करे। आज के दौर में जबकि आज़ादाना अंदाज़ की पत्रकारिता का ज़ोर है तो न जाने क्यों यह बातें अपने आप उभर कर सामने आ रही हैं।

क्या यह माना जाये कि इससे पहले के सामर्थ्यवान पत्रकार और समाचार एजेंसियाँ इस नुस्खे का इस्तेमाल नहीं करती थीं। हमारा मानना है कि अदना से अदना पत्रकारिता का विधार्थी चाहे वह परंपरागत तरीक़े से इस मैदान में आया हो या किसी आला क़िस्म के संस्थान से ट्रेंड हो कर। दोनों माध्यम में उपरोक्त मिसाल किसी  न किसी तरह कान में डाल दी जाती है। भारत जैसे देश में जहाँ हम पहले से ही विश्व गुरु का स्थान ग्रहण किए बैठे हैं यह तो और महत्वपूर्ण हो जाता है कि उठते बैठते नैतिकता और नैतिक मूल्यों का रट्टा लगाते रहें। और यह क्यों न करें, ऐसा करने से किसी का कुछ बिगड़ता है क्या?

शायद यही वजह है कि हमारे यहाँ नैतिक मूल्य भी वही हैं और नैतिकता भी वही । समाज भी वही है और लोग भी वही। शिकायत भी वही है और शिकायतकर्ता भी वही। यह संबंध भी अपने आप में बड़ा रोचक है। आज़ादी के फौरन बाद वाले लोग जिन शिकायतों का पिटारा लिये घूम रहे थे हम भी उसी पिटारे का बोझ उठाये हुये हैं। अजीब नहीं लगता कि हम इस विरासत (Legacy) को कैसे बचाये होये हैं।

समाज में परिवर्तन लाने के लिये ज़रूरी है कि नैतिक मूल्य एवं नैतिकता जीवन का हिस्सा हो न कि रटने और पठन पाठन की सामग्री। इसमें कोई दो राय नहीं है कि चलता है कि आदत ने हमें इस मुकाम पर ला खड़ा किया है। भारत जैसे देश में जहाँ पत्रकार और पत्रकारिता के लिये To Educate का शब्द प्रथम होना चाहिये वहाँ देश में अधिकतर To Confuse पर ध्यान केन्द्रित है।  

जब तक हम ऐसे माध्यम का हिस्सा बन कर व्यवस्था के लिये रिक्त स्थान की पूर्ति करते रहेंगे तब तक किसी भी बदलाव की बात बेईमानी है। इससे हम अपने पूर्वाग्रह को और आगे ले जायेंगे एवं विश्व भर में अपने विश्व गुरु होने का डंका भी पीटते रहेंगे। यह एक अलग बात है कि उसी समय देश के एक बड़े हिस्से में बहुत सी ऐसी घटनायें/ बातें घटित होती रहेंगी जिनका सीधा असर जान मानस पर पड़ेगा। विरोध तो होना दूर की बात है लोग अपने साथ हो रहे अन्याय को समझ भी नहीं पायेंगे क्योंकि उनको समझाने या उनके अंदर समझ पैदा करने वाले लोग अभी दूसरी क़िस्म की मुहिम का हिस्सा बने होये हैं।

ऐसे वातावरण में उन्ही लोगों से कुछ आशा है जो कि अभी तक समूही गतविधियों का हिस्सा नहीं बने हैं। शायद इन लोगों के सबब ही कुछ लीक से हटा हुआ पढ़ने और सुनने को मिल रहा है वरना बाज़ार मे जो लोग चलन में हैं उनका हाल सब जानते हैं।

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