पहले रमजान को समझिए और फिर स्वागत कीजिए

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नई दिल्ली :रमजान इस्लामी कैलेंडर का 9वं महीना है ये कैलेंडर चाँद की स्तिथियों के आधार पर चलता है , इस कैलेंडर को हिजरी कैलेंडर भी कहते हैं, हिजरी कैलेंडर की शुरुआत 622 ई. में हुई जब अंतिम पैगम्बर मुहम्मद साहब मक्का से मदीना गए। इसी माह में पवित्र क़ुरआन खुदा की तरफ से उतरा गया। और इस्लाम धर्म में इस माह को खुदा का महीना भी कहते है, क्योंकी खुदा ने इस माह को सब से अधिक पसंद किया है। वैसे तो सरे महीने खुदा के ही हैं मगर ये महीना खास है।


इस्लाम के 5 स्तम्भों में से एक रोज़ा है जिसमे रमजान के पूरे एक महीने रखे जाते है. क़ुरआन पाक में रोज़े के बारे में कहा गया है की “लोगों तुम पर रोज़े निर्धारित किये गए हैं जैसे की तुम से पहले लोगो पर निर्धारित किये गए थे , ताकि तुम तक़वा (इश्वर चेतना ) प्राप्त कर सको”।अरबी में रोज़े को सौम कहते हैं जिस का अर्थ होता है “खुद को रोकना” न केवल भोजन पानी ,दिन में शारीरिक संबंध बनाने से बल्कि धूम्रपान, लोगो की पीठ पीछे बुराई करने से, ग़लत भाषा का उपयोग करने से और हर तरह की बुराई करने से खुद को रोकना है।

रोज़े का मतलब ये नहीं है की मुस्लिम अपने दैनिक दिनचार्य से पीछे हट जाते हैं, बल्कि उन्हें अपने सामान्य कार्य सामान्य रूप से करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है,वास्तव में यह वो समय होता है जब किसी व्यक्ति के धैर्य और धीरज को चुनौती मिलती है. मुसलमानो का मानना है की रोज़ा केवल शारीरिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि मुख्य रूप से प्रतिबंध और आध्यात्मिक शुद्धि का समय है.

रोज़े के दौरान, मुस्लमानो का मानना है की उनकी इच्छाओं को रोक दिया जाता है और वो समझ सकते हैं की जिन को कम विशेषधिकार प्राप्त होते हैं उन्हें कैसा महसूस होता है। यह किसी के धैर्य और खुदा के प्रति निकटता और दूसरों के प्रति उदारता को बढ़ावा देने के लिए माना जाता है। यह एक ऐसा समय होता है जब मुस्लमान क़ुरआन से खुद को जोड़ने की कोशिश करते हैं, खुद को हर बुराई से बचा कर अल्लाह के नज़दीक करने की सख्त कवायद हर मुस्लमान के लिए खुद को पाक साफ़ करने का सुनेहरा मौक़ा होती है।

रमजान के महीने में मुस्लमान ग़रीबों की हर तरह से मदद करते हैं उन्हें खाने पीने से लेकर कपड़े आदि देते हैं उन का मानना है कि ऐसा करने से घर में और रोज़ी रोटी में बरकतें होती हैं , इस पाक महीने में बरकत पाने के लिए लोग ग़रीबों की मदद करते हैं। इस महीने में इंसान को मालूम होता है की एक ग़रीब व्यक्ति किस तरह से अपना जीवन व्यतीत करता है जब एक धनि व्यक्ति सारा दिन भूखा पियासा रहता है तो उसे एहसास होता है कि हमारे ग़रीब भाई कैसे अपना जीवन यापन करते हैं।

ग़रीबों की सहायता के लिए ईद से पहले पहले मुसलमान ज़कात (कुल कमाई का 2.5 प्रतिशत ) जो हर अमीर मुस्लमान को ग़रीब मुस्लमान को देना अनिवार्य है, और फितरा (वो पैसे जो घर के हर सदस्य की तरफ से घर का मालिक ग़रीबों को देता है ईद की नमाज़ से पहले है ) “फितरा उन मुसलमानो के लिए भी देना अनिवार्य है जो अमीर नहीं है मध्य से भी नीचे वाले। ” अदा करते हैं। जिस से ग़रीब लोग भी ईद की तैयारी कर लें और वो भी ईद मना सकें। कुल मिला कर यह महीना एक साथ कई पैगाम ले कर आता है और मुसलमान इस में खूब इबादत कर के अपनी स्वाब की कमाई में बढ़ोतरी कर लेता है।इस महीने में मुस्लमान पूरी लगन के साथ ईश्वर की इबादत करते हैं और हर प्रकार के गलत कार्य और रास्तों को छोड़ देता है। बस यह समझे की इस महीने में मुसलमान अपना शुद्धिकरण करवाता है और अपने ईश्वर का प्रय बनने की कोशिश करता है।

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