2019 का चुनाव : क्या सिर्फ वादों के सहारे विकास संभव है ?

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17 वीं लोकसभा चुनाव 2019 का बिगुल बज चुका है. चुनाव आयोग ने पूरे देश में 7 चरणों में चुनाव की घोषणा की है. 11 अप्रैल को पहला चरण और 19 मई को आखिरी चरण होगा. 23 मई को परिणाम की घोषणा होगी. इस बार पिछले लोकसभा चुनाव के मुक़ाबले में लगभाग 8 करोड़ मतदाताओं की संख्या बढ़ी है. चुनाव आयोग के अनुसार कुल मतदाताओं की संख्या 81 करोड़ से कुछ ज़्यादा है. स्वतंत्र भारत में पहली बार होने वाले लोकसभा चुनाव 1951-52 में 17 करोड़ मतदाता थे और 2019 में लगभाग 63 करोड़ के इज़ाफा के साथ ये संख्या 81 करोड़ पार कर चुकी है.

ये चुनाव कई मायनों में बेहद अहम है. 2014 के चुनाव और वर्तमान सरकार के 5 वर्षीय कार्यकाल को देखा जाए तो जिस उत्साह से और जिन उम्मीदों से बीजेपी को बहुमत मिली थी उन उम्मीदों पर बीजेपी सरकार खरी नहीं उतरी.

भ्रष्टाचार, शिक्षा, रोज़गार, महिला सुरक्षा, आर्थिक सुधार और सबका साथ सबका विकास के नारों से मोदी सरकार को सत्ता मिली. लेकिन पिछले पांच वर्षों में हुए विकास की रफ्तार का विश्लेषण किया जाए तो मालूम होगा कि इन वर्षों में ये मुद्दे तो गायब ही हो गए हैं. रोज़गार, महिला सुरक्षा की बात करें तो देशवासियों को ऐसा दिन भी देखना पड़ा जब कठुआ में हुए एक नाबालिग बच्ची के रेप के आरोपियों को बचाने के लिए दक्षिणपंथीयों ने रैली निकाली और उस मासूम बच्ची का केस लड़ने वाली वकील को धमकाया गया. क़ानून व्यवस्था पर बात करें तो बहुत चिंताजनक स्थिति बन गयी है. देश में भय का माहौल है. ‘मॉब लिंचिगं’ एक ऐसी शब्दवाली जिस से हिंदुस्तान का आम नागरिक पिछले 5 साल में परिचित हुआ . गौमांस के नाम पर, लव जिहाद के नाम पर देश में उग्र भीड़ ने निर्दोष व्यक्तियों को बे दर्दी से मार दिया. इस मामले में सीधे सरकार की आलोचना उचित नहीं लगती लेकिन आलोचना उस वक़्त उचित हो जाती है जब मॉब लांचिंग अंजाम देने वाले लोगों के खिलाफ उचित कार्रवाई नहीं की जाती बल्कि ज़मानत पर रिहा होने वालों का बीजेपी के नेता फूलों की माला से स्वागत करते हैं. ऐसे लोगों की तस्वीरें किसी ना किसी बीजेपी नेता के साथ नज़र आती है.

बेरोज़गारी के मुद्दे पर भी सरकार से सवाल नहीं किया जा रहा. जिस मोदी जी ने 2014 के चुनाव प्रचार में 2 करोड़ नौकरियों का वादा किया था बाद में खुद एक अद्भुत इंटरव्यू में पकोड़ा बेचने को रोज़गार बताते नज़र आए.

राष्ट्रवाद का ऐसा ज़हर घोल दिया गया है कि मोदी विरोधी होने का मतलब देशविरोधी और देशद्रोही हो गया है. 5 साल में तो ऐसे बहुत से मामलात सामने आए लेकिन अभी हाल का वाकिया है कि अपने विवादास्पद और आपत्तिजनक ब्यानों से बहुचर्चित बिहार से एक सांसद ने मोदी जी की पटना रैली में शामिल ना होने वालों को देशद्रोही का खिताब दे दिया था लेकिन हुआ कुछ यूं कि वो खुद इस कार्यक्रम में शामिल ना हो सके. तो उनकी बातें खुद उन पर ही लागू होती नज़र आती हैं .

मीडिया जो किसी भी लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होता है उसकी हालत भी मोदी सरकार के माउथ पीस की हो गयी है. न्यूज़ चैनल के ऐंकर प्रवक्ता लग रहे हैं. तीन तलाक़, लव जिहाद, गौ मांस, राम मंदिर जैसे मुद्दों पर कई दिनों तक शोर शराबे होते हैं. ऐसे कार्यक्रमों को डीबेट का नाम देना डिबेट शब्द की तौहीन है. एक वक़्त था जब टी वी के डिबेट में एक से एक विद्वान क़िस्म के लोग नज़र आते थे अब उनकी जगह ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने वाले प्रवक्ता और मौलवी – पंडित जैसे डील डौल वालों ने ले ली है. ये सब एक दिन में नहीं हुआ है. बल्कि ये बहुत सोच समझ कर किया जा रहा है. देश को इन अनसुलझे मसलों में उलझा दिया गया है ताकि कोई सरकार से ये सवाल ही ना करे कि किसान क्यूँ आत्महत्या कर रहे हैं, क्यूं भीड़ ने क़ानून को अपने हाथों में लेना शुरू कर दिया है, क्यूं बेरोज़गारी की समस्या बढ़ रही है, क्यूं देश की आर्थिक स्थिति बिगड़ रही है. नोट बंदी से आतंकवादियों की कमर टूट चुकी है तो क्यूँ पठानकोट, उरी और पुलवामा जैसे दिन हमें देखने को मिल रहे हैं.?

देश में स्वतंत्र राय रखने वालों का जीना भी मुश्किल हो गया है. जस्टिस लोया, गौरी लंकेश और इस तरह ना जाने कितने लोग हैं जिनकी ज़ुबान हमेशा के लिए बंद कर दी गयी. हमें ये समझना होगा कि मोदी भारत नहीं है, मोदी भारत का पर्यायवाची नहीं है देश के प्रधानमंत्री है और एक लोकतांत्रिक देश का नागरिक होने के नाते देश के हर नागरिक को संवैधानिक अधिकार है कि मोदी सरकार या जो भी सरकार हो उसकी नीतियों की आलोचना करें. संवैधानिक अधिकारों का हनन होना देश को कमज़ोर करता है. दुनिया के सब से बड़े लोकतंत्र होने का हमें गर्व हासिल है लेकिन लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों का हनन कर के हम एक बुरी मिसाल क़ायम कर रहे हैं. जिन 70 वर्षों की खामियों का ज़िक्र बार बार किया जाता है उसी 70 वर्षों में हमने एक लोकतांत्रिक, आधुनिक और विकासशील देश होने का गौरव प्राप्त किया है लेकिन अफसोस कि सिर्फ 5 वर्षों में हमने ऐसा माहौल देख लिया जो शायद देशवासियों ने आपातकाल के दिनों के अलावा कभी नहीं देखा हो.
इसलिएहमें तय करना होगा कि 2019 में भी हम देश को इसी दिशा में ले जाना चाहते हैं जहां नफरत, धार्मिक उन्माद, फर्जी राष्ट्रवाद, मॉब लिंचिंग, बेरोज़गारी, झूठे वादे और फर्जी आंकड़े बताने की रिवायत चल रही है या फिर हम इस से निजात चाहते हैं.

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