न जाने कब तक…….

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*सरिता *
मास कम्युनिकेशन (जन संचार) की छात्रा,
केंद्रीय विश्विद्यालय, जम्मू

रंग-बिंरगे गुब्बारे और कुछ नम-सी आंखे! अजीब लगा ना पढ़ कर। हां , क्योंकि सच्चाई पहली दफा जानने पर अजीब ही लगती है।
बचपन में पापा जब मेरे लिए गुब्बारे लाते थे तब मैं उन गुब्बारों को पाकर खिल-खिला उठती थी। लेकिन कल, मैंने जब उन गुब्बारें बेचने वाले बच्चों को देखा तो कुछ पल के लिए स्तब्ध हो गई। सोचने लगी , कि ये सब गुब्बारें क्यों बेचते है? फिर पता चला कि इससे कुछ पैसे मिल जाते है जिससे वे खाना खरीदते है और इस तरह वे अपना गुजर-बसर करते है। कैसा इत्तेफाक है न, कि कुछ के पास इतना पैसा होता है कि गिने भी ना जा सके और कुछ को पेट भर खाने के लिए भी हर दिन मशक्कत करनी पड़ती है।
कई बार बचपन मेें मैंने पापा को उन गुब्बारें वालों से बाते करते सुना पर तब सब मेरे लिए धुंधला-धुंधला सा था। पर अब मैं वो सब सोचती हूं तो थम जाती हूं। अब समझ आती है पापा की वो सीख कि “खाने की प्लेट में उतना ही डालों जितनी जरूरत हो। न जाने कितने बच्चें देश में ऐसे है जिन्हें दो वक्त का खाना भी नसीब नही होता।” तब मै उन बातों को सुन कर भी अनसुना कर देती थी लेकिन अब समझ आता है कि ये हमारे समाज की असली तस्वीर है।


कुछ दिनों बाद मैं फिर उन गुब्बारें बेचने वाले बच्चों से मिली, उनमें से ज्यादातर की उम्र 12 से 15 साल के बीच की रही होगी। मैंने देखा, कि जिस उम्र में मेरे मन में पढऩे की बातें रहती थी, इन बच्चों को पेट भरने के लिए पैसे कमाने की मजबूरी है। जिस उम्र में मेरे हाथों में किताबें और कलम रही , उन बच्चों के पास बेचने के लिए गुब्बारें है।
चाहें, सरकार द्वारा बाल मजदूरी को रोकने के लिए बड़े कानून बना दिए गए हो, छह से चौदह साल के बच्चों के लिए मुफ़्त शिक्षा पाने का मौलिक अधिकार दस्तावेज़ो में लिख दिया गया हो।
लेकिन आज भी हम लोग अपने आस-पास पेट भर खाने के लिए बच्चों को मजूदरी करते देख रहे है। कुछ चौक -चौराहों पर भीख मांगने को मजबूर है तो कुछ गुब्बारें आदि सामान बेच कर खुद का गुजारा कर रहे है और सरकार के सभी दावे कागजों तक सीमित रह गए है।

एक्शनएड इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में हर 11 बच्चों में एक जीवित कमाई करने के लिए काम करता है। वहीं
जनगणना 2011 के आंकड़ों के मुताबिक भारत में 5-18 साल की उम्र के बीच 33 मिलियन बाल मजदूर हैं।

जिस दिन मैं ये लेख लिख रही हूं और जिस दिन आप इस कहानी को पढ़ रहे है। उस दिन भी उन बच्चों ने गुब्बारें बेच कर अपना पेट भरा होगा। ये ऐसी सच्चाई है जिसको झुठलाया नही जा सकता।
शायद ये सिलसिला चलता रहा है और चलता रहेगा। मुझ जैसे कितने बच्चें गुब्बारें देख कर खुश हो जाया करेंगे और उन गुब्बारों की खुशी हवा में लुप्त हो जाया करेगी, पर इन बच्चों का जीवन एेसे ही चलता रहेगा
न जाने कब तक!

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