मोदी जी और स्वदेशी प्रेम

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लेखक : ज़ुबैर आलम

भारतीय भाषा केंद्र,जेएनयू,नई दिल्ली

मोबाइल नंबर: 9968712850

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के अंदर देश प्रेम बहुत है, ऐसा लोग कहते हैं. शायद यही वजह है कि वह देश में निर्मित सामानों को इस्तेमाल करने की अपील भी करते हैं. लेकिन दिलचस्प चीज़ यह है कि वह हर प्रकार के देश निर्मित सामानों /उत्पादों /सेवाओं के लिये सामने नही आते. एक कल्याणकारी राज्य में जनता के द्वारा निर्वाचित मुखिया से उम्मीद की जाती है कि वह जब जनता से देश निर्मित सामानों/ उत्पादों को इस्तेमाल करने की अपील करेगा तो सरकारी निगरानी में चल रही कंपनियों/ कल कारखानों के सामानों को प्रमोट करेगा.

इस तरह के सवालों के बीच जब हम अपने प्रधानमंत्री की पिछले चार साल की इस तरह की अपीलों को देखते हैं तो शायद खादी के बने वस्त्रों को छोड़ दिया जाये तो अधिकतर समय वह निजी कंपनियों के साथ खड़े नज़र आये हैं. यहाँ पर सिर्फ दो उदाहरणों के द्वारा अपनी बात को रखने की कोशिश करूंगा. पहला राफेल सौदे में हिंदुस्तान ऐरोनोटिक्स लिमिटेड (HAL) की जगह अनिल अंबानी की कंपनी का आना, दूसरा BSNL और उसकी सहायक कंपनियों की जगह रिलायंस जियो के साथ सीधे तौर पर खड़े होना.

राफेल सौदा आज के समय में सबसे अधिक चर्चित है. इस सौदे में कैसे कैसे राज़ छुपे हैं इससे हमें सीधे तौर पर कोई मतलब नहीं है. हमारी दिलचस्पी का केंद्र अनिल अंबानी की नव निर्मित कंपनी है जो डिफेंस संबंधी सामानों/ हथियारों के उत्पादन और रख रखाव के लिये बनी है. सबको मालूम है कि यह कंपनी राफेल सौदे में बतौर पार्टनर के शामिल है. एक्सपर्टस की बात मानें तो अनिल अंबानी की इस कंपनी के पास डिफेंस से जुड़ा कोई अनुभव नहीं है. इसके विपरीत HAL के पास बहुत अनुभव है लेकिन इसे सौदे से बाहर रखा गया है.

माननीय प्रधानमंत्री की उपस्थिती में राफेल सौदा तय हुआ है इसलिये यह सवाल बहुत गंभीर बन जाता है कि आखिर क्या कारण है कि इस सौदे में एक अनुभवहीन निजी कंपनी के आगे एक अनुभवी सरकारी कंपनी को नज़र अंदाज़ किया गया? यह सवाल और संवेदनशील इसलिये हो जाता है क्योंकि मामला सेना से जुड़ा हुआ है. वैसे तो प्रधानमंत्री एवं उनके सहयोगी सेना और उससे जुड़े सवालों के चैम्पियन माने जाते हैं लेकिन यहाँ पर उनकी और उनके सहयोगियों की चुप्पी आम जनता की समझ से बाहर है.

इसी तरह सरकारी कंपनी BSNL एवं उसकी सहयोगी कंपनियों के स्थान पर रिलायंस जियो के लिये सीधे तौर पर प्रधानमंत्री का मैदान में उतरना भी बहुत से लोगों की समझ से बाहर है. यह बात सबको मालूम है की BSNL और उसकी सहायक कंपनियाँ अपने खराब दौर से गुज़र रही हैं. ऐसे में वर्तमान सरकार के द्वारा इन कंपनियों के सम्मान बहाली का प्रयास ज़्यादा बेहतर होता. दूरसंचार के मैदान में पहले से ही निजी कंपनियाँ सरकारी कंपनियों के लिये संकट पैदा कर रही हैं. सरकारी कंपनियों पर खराब प्रदर्शन और खराब सुविधाओं का आरोप आमतौर पर लगता रहता है. जिसका नतीजा यह है कि ग्राहक निजी कंपनियों की सेवा को पसंद कर रहे हैं और सरकारी कंपनियाँ ग्राहक विहीन हो रही हैं. ऐसे माहौल में वर्तमान सरकार का रिलायंस जियो के हक़ में खड़ा होना कुछ सवाल पैदा करता है. क्या सरकार की यह मंशा है कि इस मैदान में सरकारी कंपनियों का अस्तित्व समाप्त हो जाये? क्या बात बात में देश की जनता का हवाला देने वाली वर्तमान सरकार जनता के सरोकारों को परे रखते हुये कुछ बड़े कारोबारी घरानों को बढ़ाने में लगी हुयी है?

प्रस्तुत किये गये दोनों उदाहरणों से आप लोग भी जान गये होंगे कि किस तरह देश और उसकी अस्मिता की दुहाई देने वाली वर्तमान सरकार जनता के हितों की अनदेखी करते होये कारपोरेट दिग्गजों के साथ खड़ी है. रोज़गार के अभाव से जूझ रही इस सरकार की असंवेदनशीलता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उसके द्वारा किये गये फैसलों से सरकारी कंपनियों में कार्यरत लोगों पर भी बेरोज़गारी का खतरा मंडराने लगा है. तमाम बातचीत का सार यह है कि जब कोई सरकार देश और उसकी अस्मिता की दुहाई बार बार देने लगे तो होशियार और चौकन्ना होने की ज़रूरत है क्योंकि यह भी हो सकता है कि इस आड़ में सरकार द्वारा किसी व्यक्ति विशेष/ कंपनी विशेष को सीधे लाभान्वित किया जा रहा हो.