तलाक़.तलाक़.तलाक़

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लेखक:हुमा नसरीन

पिछ्ले कुछ महीनो से तीन तलाक़ का मुद्दा सुर्खियो मे छाया हुआ है। मीडिया मे इस पर ज़ोरदार बह्स चल रही है। वास्तव मे इस के क्या प्रावधान है इस से बेखबर केवल समुदाय विशेष को निशाना बनाया जा रहा है महिला अधिकार के नाम पर, और समुदाय विशेष भी शायद खुद को बेहतर तरीक़े से मीडिया के समक्ष प्रस्तुत नही कर सका। सरकार भी मानवअधिकार के नाम पर तीन तलाक़ मे सारी मानवता समेट कर मुस्लिम महिलाओ को उनका अधिकार दिलाने के नाम पर अपना स्वार्थ भेद रही है।

तीन तलाक़ पर मसला यहाँ से पैदा होता है कि पति गुस्से मे आ कर तीन बार तलाक़,तलाक़,तलाक़ बोल दे और पत्नि अपना बोरिया बिस्तर बांध ले ये कैसा न्याय है ?..वास्तव मे तलाक़ का ये स्वरुप इस्लाम मे नही है ये अलग बात है कि मुसलमानो मे है विचार करने खुद ये बात सामने आती है कि जिस विवाह बन्धन को बांधने मे विभिन्न चरण से हो कर गुज़रना पडता है तो फिर उसको तोडने के लिए कोई प्रक्रिया या नियम कैसे नही होगा…किसी भी स्न्सथा,सगठन को सफल रुप से चलाने के लिए नियम क़ानून के साथ व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतन्त्रता और अधिकार को ध्यान मे रख कर कुछ विकल्प भी होते है जिससे शंति पुर्ण रुप कोई भी काम हो सके ।विवाह भी एक सामाजिक और धार्र्मिक प्रक्रिया है जिसका उद्देश्य सफल एवम सम्पन्न समाज का निर्माण करना व जीवन का सुख प्राप्त करना है। अगर एसा लगे कि इस के सही उद्देश्यो को हासिल नही कर सकते जीवन मे मुशिकले पेश आ रही है तो दोनो पक्षो के पास विकल्प होता है कि वह आपसी सह्मति से बिना किसी को नुक़सान पहुंचाये नियमानुसार अलग हो सकते है।

रिफाक़ते कभी ज़न्जीर पा नही होती।

न चल सको तो बिछड जाओ दोस्तो की तरह्॥

बहस तीन तलाक़ पर नही एक ही बार मे तीन तलाक़ पर है इसको ले कर काफी लम्बे समय से दुसरे समुदाय मे विरोध का स्वर सुनाई देता रहा है मगर मामला उस समय गम्भीर रुप धारण कर लेता है जब उत्तराखण्ड की एक महिला सायरा बानो ने फरवरी 2016 को सुप्रीम कोर्ट मे फरियाद की कि तीन तलाक़.हलाला और चार शादी को गैर क़ानूनी क़रार दिया जाये सायरा बानो के बाद चार और महिलाओ ने सुप्रीम कोर्ट मे इस के खिलाफ गुहार लगाई और न्याय की माग की इस के साथ मामला तूल पकड्ता गया और अनेक सामाजिक,धार्मिक और राजनितिक सन्स्थाए मुस्लिम महिलाओ को अधिकार एवम न्याय दिलाने के लिए निकल पडी।11 मई से सुप्रीम कोर्ट मे 5 जजो की एक बेन्च ने इस पर सुनवाई की और फिर मामले को कोर्ट मे सुरक्षित कर दिया।

मुस्लिम धर्म गुरु और तनज़ीमो की तरफ से इस पूरे मामले मे जो असवेद्नशीलता देखने मे आई वो अफसोसनाक रही। इस्लाम धर्म मे निकाह,तलाक़ और चार विवाह का जो सही स्वरुप है उसको अगर पेश किया जाता तो मुस्लिम महिलाओ को न कही और जा कर गुहार लगानी पड्ती और न ही अवसरवादियो का इस मे ह्स्त्क्षेप हो पाता ।मुस्लिम महिला अधिकार के नाम पर राजनीति दाव खेले जाने लगे ।मुस्लिम विरोधी छ्वि रखने वाले लोग मुस्लिम महिलाओ से सहानुभूति जता कर अपनी मुस्लिम विरोधी छ्वि को चमकाने लगे मगर उलेमाए कराम, धर्म सरक्षक लोग इधर उधर की बात करते रहे अपनी मुल्लागिरी,सरकार की खुश्नुदी के चक्कर मे तथ्यो और तर्को से परे जा कर बोलते रहे या तो फिर अतिवादी बन कर जग हसाई का मौक़ा देते रहे।

महिला अधिकार के नाम पर इस्लाम मे वो सारे अधिकार महिलाओ को प्राप्त है जो कि उन्हे सामाजिक मान सम्मान दिला सके इस्लाम की गलत छ्वि पेश कर के महिलाओ को प्रताडिता के रुप मे पेश किया जाता है जिसका कारण मुस्लिम समाज मे शिक्षा का अभाव,अंधविश्वास और धार्मिक कट्टरता है।सोचने, समझने और प्र्श्न न करने से धर्म अधिकारो का हनन करता हुआ ही लगेगा। ये पित्र स्त्त्तात्म्क समाज की रीत है कि महिला को हर स्तर पे प्रताडित कर के अपनी सत्त्ता को बाक़ी रख्ना चाहते है. ये केवल मुस्लिम समाज की सोच नही बल्कि मर्द समाज की सोच है। बेशक तीन तलाक़ महिला अधिकरो को ले कर एक गम्भीर मुद्दा है उनके अधिकारो का ह्नन भी है लेकिन जब हम रोज़ाना ब्लात्कार के समाचार देखते है तो फिर सारे महिला अधिकरो पर प्र्श्न चिन्ह लग जाता है॥।

 

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