BPSC मतलब बेवजह परेशान करने वाली स्क्रूटनी कमिटी !!

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Imran Iraqee

नवम्बर 2014 में BPSC ने बिहार के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में सहायक प्रोफेसर की भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया था। लगभग दो बरस गुज़र जाने के बाद बहाली की परिक्रिया शुरू की गई और कई विषयों के साक्षात्कार के बाद बहाली किया गया। लेकिन विज्ञापन के आज पांच साल गुज़र जाने के बाद भी कई विषय के अभ्यार्थी इंतज़ार की घड़ियाँ गिन रहे हैं। मतलब यह की 2014 में शुरू होने वाली यह परिक्रिया अभी तक परिकर्मा ही कर रही है तो इससे अभ्यर्थियों के भू भाग और दिमाग में उठने वाले भूचाल का अंदाज़ा आप लगा ही सकते हैं! ज्ञात हो की जिन विषय के अभ्यर्थी बरसों से इंतज़ार की घड़िया गिन रहे थे उनमे उर्दू विषय के अभ्यर्थी भी शामिल हैं। कुछ दिनों पहले ही bpsc ने उर्दू विषय की बहाली के लिए साक्षात्कार की तारीख का ऐलान कर दिया है। लेकिन इस ऐलान से कई अभ्यर्थियों को गहरा धक्का लगा है। हुआ यूँ कि साक्षात्कार के लिए bpsc ने सिर्फ 390 अभ्यर्थियों को ही बुलाया है। जबकि bpsc ने योग्य उम्मीदवारों कि एक लिस्ट साल / डेढ़ साल पहले भी जारी किया था और अब इंटरव्यू लिस्ट के साथ भी जारी किया है जिसमे 1081 योग्य उम्मीदवारों के नाम हैं। ज़ाहिर है एक मुश्किल और पेचीदा स्क्रूटनी परिक्रिया के बाद ही 390 अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिया चुना गया है। साक्षात्कार के लिए जो कट ऑफ़ मार्क्स  (जो कि सक्षणिक प्रतिशत के आधार पर है) तय किया गया है वो कुछ इस तरह है :

Gen (1) 60.95

S.C (2) 49.15

EBC (4) 49.10

B.C (5) 34.00

BCL (6) 40.45

Additional Disabled (VI) 32.80

Additional Disabled (DD) 54.25

Additional Disabled (OH) 43.50

दिलचस्प है कि कट ऑफ़ मार्क्स में अभ्यर्थियों की शैक्षणिक गतिविधियों को इस क़ाबिल नहीं समझा गया कि उसके पॉइंट्स जोड़े जाएँ। इस लिए राष्ट्रिय और अन्तराष्ट्री सेमिनार में आर्टिकल पेश करने वाले, UGC के द्वारा स्वीकृत पत्रिकाओं में शोध पत्र प्रकाशित करने वाले और विभिन्न शोध पुस्तक लिख चुके अभ्यर्थियों को कोई एक्स्ट्रा पॉइंट्स नहीं दिया जा रहा है। जबकि सहायक प्रोफेसर की बहाली के लिए UGC गाइडलाइंस के मुताबिक इन चीजों के पॉइंट्स बनते हैं। लेकिन BPSC ने UGC नियम को हाशिये पर डाल दिया है। बल्कि देखा जाये तो मुझे UGC गाइडलाइन का ही कुछ समझ नहीं आता। गाइडलाइन ना हुआ अदालत का कोई फैसला हो गया ! UGC लाख गाइडलाइन बना ले राज्य अपने बनाये हुए नियम पर ही काम करेगी, कोई क्या कर लेगा ? विज्ञप्तियों का UGC गाइडलाइन के मुताबिक होने का ऐलान तो किया जाता है लेकिन राज्य अपने नियम के मुताबिक शैक्षणिक और दूसरे तरह के शोधपत्रों पर पॉइंट्स देती है। इसके बाद भी राज्य का यह कहना कि बहाली पूरी तरह से UGC गाइडलाइन के मुताबिक हुई है, कितना सही है ? जैसे BPSC शोधपत्रों और दूसरे तरह के सक्षणिक गतिविधियों पर तो कोई पॉइंट्स ना देकर UGC नियम का उलंघन तो कर रही है लेकिन M.phil और P.hd की डिग्री इन्हे UGC 2009 नियम के मुताबिक चाहिए।

गौर तलब है कि BPSC ने अभ्यर्थियों को परेशान करने का मन शुरू से ही बना रखा है। सब से पहले तो M.phil और P.hd की डिग्री, UGC 2009 नियम के मुताबिक होने का प्रतिज्ञापन, जो रजिस्ट्रार के द्वारा जारी किया गया हो, माँगा गया। नियम के अनुसार देखा जाये तो P.hd की हद तक यह मामला ठीक है क्यूंकि P.hd का मामला रिसर्च कमिटी या रिसर्च बोर्ड से होता है इस लिए रजिस्ट्रार से प्रतिज्ञापन मिलना कोई मुश्किल नहीं लेकिन M.phil के मामले में यह मुमकिन नहीं। क्यूंकि M.Phil का सम्बन्ध सीधे तौर पर डिपार्टमेंट से होता है। रिसर्च कमिटी, बोर्ड या बोर्ड ऑफ़ रिसर्च स्टडीज से नहीं होता। इस लिए डिग्री सर्टिफिकेट के अलावा अलग से कोई भी लेटर या प्रतिज्ञापन जारी करना होगा तो वो या तो डिपार्टमेंट करेगा या डीन भी कर सकता है। इसके बावजूद BPSC अपनी ज़िद पर अड़ी रही। अब बिहार में किस तरह की वय्वस्था है यह तो वहां के विश्विद्यालयों के ज़िम्मेदार ही बता सकते हैं। इन तकनिकी और नियामक बातों को समझे बगैर BPSC ने मनमानी करते हुए M.PHIL की डिग्री को UGC 2009 नियम के बगैर बता कर अभ्यर्थियों की हकतलफी की है। हैरत तो इस बात पर है कि BPSC को M.Phil की मार्कशीट में दिए हुए कोर्सवर्क के अंक भी दिखाई नहीं देते, जो इस बात का साक्ष्य है कि यह कोर्स UGC 2009 नियम के तहत किया गया है।

मामला यहाँ तक भी ठीक था कि अभ्यर्थी कम से कम एलिजिबल लिस्ट में शामिल तो थे। लेकिन BPSC की स्क्रूटनी कमिटी ने जो दूसरा पैंतरा दिखाया वो हैरत अंगेज़ है। BPSC की स्क्रूटनी कमिटी के महान सदस्यों ने विभिन्न राज्यों के मदरसा बोर्ड और कुछ निजी मदरसों के सर्टिफिकेट को ही शक के घेरे में ले लिया। लगभग एक साल पहले ही BPSC ने मदरसा बोर्ड या निजी मदरसों से पासआउट अभ्यर्थियों से सर्टिफिकेट की समकक्षता का प्रमाण माँगा था। सारे अभ्यर्थियों ने मदरसा और राज्यों के नियम के मुताबिक सर्टिफिकेट की समकक्षता का प्रमाण भी BPSC को भेज दिया। इसके बावजूद BPSC ने मनमानी करते हुए बिहार मदरसा एजुकेशन बोर्ड को छोड़ कर, दूसरे राज्यों के मदरसा बोर्ड और कई प्रमुख मदरसों के सर्टिफिकेट की समकक्षता को मानने से इनकार कर दिया। जबकि इन सारे मदरसों के सर्टिफिकेट को देश की प्रमुख विश्विद्यालय भी मानती है तभी तो ये विद्यार्थी देश के सेंट्रल विश्वविद्यालयों से M.Phil और P.hd कर पायें हैं और इन्ही सर्टिफिकेट की बुनियाद पर कई प्रतियोगी परीक्षाओं में कामयाब हो कर नौकरी भी कर रहे हैं। ऐसी कई मिसालें भरी पड़ी हैं।

अभ्यर्थियों की स्क्रूटनी का यह नतीजा है कि ऐसे अभ्यर्थी जिन्होंने मेट्रिक,इंटरमीडिएट और ग्रेजुएशन की शिक्षा मदरसा बोर्ड से हासिल की थी, वो इंटरव्यू देने से महरूम किये जा रहे हैं। जबकि उनके पॉइंट्स भी अच्छे हैं। यानि वो अभ्यर्थी जिन्होंने बिहार के अलावा दूसरे राज्यों के मदरसा बोर्ड से फोकानिया, मौलवी और आलिम और फ़ाज़िल की डिग्री हासिल की है, जो कि मैट्रिक, इंटरमीडिएट और ग्रेजुएशन के समकक्ष है, BPSC उनके शैक्षणिक सर्टिफिकेट पर ज़ीरो पॉइंट दे रही है। सवाल यह कि BPSC यह कैसे तय कर लेती है कि मदरसा बोर्ड के समकक्ष शिक्षा हासिल किये हुए अभ्यर्थी इंटरव्यू के लिए एलिजिबल नहीं हैं ? अगर ऐसा था तो BPSC ने विज्ञप्ति के विज्ञापन में ही इस बात को साफ़ क्यों नहीं किया कि मदरसा बोर्ड के पासआउट विद्यार्थी इस बहाली के लिए एलिजिबल नहीं हैं ? लेकिन इससे ज़्यादा हैरत की बात और क्या हो सकती है कि BPSC एक तरफ तो खुद ही यह कह कर, कि ये विद्यार्थी सहायक प्रोफेसर के लिए योग्य अभ्यर्थी हैं, लिस्ट जारी करती है और फिर खुद ही उन्हें उनकी योग्यता पर ज़ीरो पॉइंट्स देती है।

ज्ञात हो कि विभिन्न राज्यों में स्कूल एग्जामिनेशन बोर्ड के अलावा मदरसा बोर्ड और संस्कृत बोर्ड भी राज्यों ने ही स्थापित किये हैं। जो मेन स्ट्रीम से अलग समकक्ष सरकारी संसथान हैं। इन समकक्ष संसथानों  की शिक्षा को खुद सरकार ने मेन स्ट्रीम की शिक्षा के समकक्ष माना है। इन संस्थानों से मैट्रिक, इंटरमीडिएट और ग्रेजुएशन और एम्-ए के समकक्ष डिग्री जारी किया जाता है। जैसा की बिहार में मदरसा एजुकेशन बोर्ड और संस्कृत एजुकेशन बोर्ड भी है। इसी तरह यु-पी और दूसरे राज्यों में भी है। गौर तलब है कि बिहार से अलग हो कर बनने वाला झारखण्ड राज्य में अलग से मदरसा और संस्कृत बोर्ड अभी तक कायम नहीं हुआ है। झारखण्ड अकेडमी कौंसिल नामी संसथान, जो कि मैट्रिक, इंटरमीडिएट की डिग्री जारी करता है, इसी संसथान को यह भार दिया गया है कि वो मदरसा और संस्कृत के शिक्षण संस्थानों की डिग्री जारी करे। जब एक ही संसथान मैट्रिक और इस के समकक्ष मदरसा और संस्कृत स्कूलों की डिग्री जारी कर रहा है तो फिर इन डिग्रियों को शक की निगाह से क्यों देखा जा रहा है। लेकिन BPSC की पक्षपातपन देखें कि इसी झारखण्ड अकेडमिक कौंसिल से जारी मैट्रिक और संस्कृत की डिग्री को वैध मानते हुए विभिन्न विषयों के साथ संस्कृत के अभ्यर्थियों को बगैर किसी चूं-चुरा के बहाल करती है लेकिन बात जब मदरसा की आई तो इसी झारखण्ड अकेडमिक कौंसिल से जारी मदरसों की डिग्री को शक के घेरे में दाल दिया, फिर प्रतिज्ञापन भी माँगा गया, इसके बावजूद झारखण्ड अकेडमिक कौंसिल से मदरसा के डिग्री धारियों को इंटरव्यू से बाहर कर दिया गया।

सब से अहम् बात यह कि BPSC यह क्यों भूल जाती है कि भारत में एक शिक्षण वयवस्था नहीं है। अगर मदरसा बोर्ड को अहमियत दी जाती है तो संस्कृत बोर्ड को भी वही हक़ हासिल है। स्कूली शिक्षण वयवस्था में भी राज्यों के बोर्ड के साथ ही केंद्रीय बोर्ड और आई-सी-एस-सी बोर्ड भी मौजूद है।

इन तमाम बातों के बाद जो नतीजा निकलता है वह ये कि BPSC इस बहाली को लटकाना चाहती है क्योंकि इस तरह की स्क्रूटनी के बाद अभ्यर्थी अदालत का दरवाज़ा खटखटाएंगे और इससे बहाली अधर में लटक जाएगी। लेकिन अभ्यर्थी के पास भी अदालत का दरवाज़ा खटखटाने के अलावा कोई चारा नहीं है। मुझे यकीन है कि अदालत का फैसला अभ्यर्थियों के पक्ष में ही होगा। लेकिन अभ्यर्थी जो इस लड़ाई में अपना वक़्त और पैसा लगाएंगे, इसका हर्जाना कौन देगा ? आर्थिक मुआवज़ा तो फिर भी दिया जा सकता है लेकिन जो वक़्त बर्बाद होगा, उसकी भरपाई कौन करेगा ? क्या अदालत एक बार फिर सिर्फ अपना फैसला सुना कर रह जाएगी या इस तरह की स्क्रूटनी कमिटी के खिलाफ कोई सख्त कदम उठाएगी ? एक आम नागरिक के सम्बन्ध में जब कोई अदालत फैसला सुनाती है तो कसूरवार के लिए सजा का भी चुनाव करती है।

अदालत से मेरी गुज़ारिश है कि इस तरह की स्क्रूटनी कमिटी की तमाम सदस्यों के साथ सख्त से सख्त करवाई करे ताकि अभ्यर्थियों ने जो अपना वक़्त और खून जलाया है, उसकी भरपाई हो सके।

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