मिट्टी के दीये, मिट्टी के ख्वाब।

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गुलशन उधम

करीब तीसरी बार फ़ोन की घण्टी बजती है।
सोच में डूबा ध्रुव अपनी चेयर से उठ कर फ़ोन रिसीव करता है।
ओ परा, फ़ोन ते चक लिया कर। फ़ोन से आवाज़ आती है।
फोन साइलेंट था, भाई। कहो कैसे याद किया।, ध्रुव ने कहा।
दीवाली है 2 दिन बाद और बहुत काम है करने को। आ सकते हो?,अभी।
फ़ोन कर रहे व्यक्ति ने ध्रुव से पूछा।
थोड़ा सोचने पर ध्रुव ने कहा कि हाँ, आ जाता हूं।
ध्रुव जल्दी से तैयार हुआ, और काम के लिए निकल पड़ा।
घर से निकलते हुए कई ख्याल उसके मन मे आ रहे थे। उसकी जेब मे सिर्फ 10 रुपये का एक नोट बचा था। और 2 दिन बाद दीवाली का त्यौहार था। एकाएक मिले काम ने उसकी उम्मीद जगा दी थी। कि इस दीवाली को वे अच्छे से मना सकेगा।
इतने में माँ ने आवाज़ दी, कि आते समय कुछ दीये और रसोई के लिए बल्ब लेते आना।
मेहनतकश के लिए तो त्यौहार भी मुसीबत की तरह ही होते है।
सही है माँ, धन्नासेठों की तो हर रोज दीवाली होती है और जो दिन रात मेहनत करता है उसकी तो दीवाली भी आम दिन की तरह ही होता है।
पर तु चिंता क्यों करती है माँ, तू बता दे क्या क्या लाना है। मैं शाम को ले आयूँगा। कह कर ध्रुव चल दिया।
रास्ते मे ध्रुव के मन में कई सवाल उमड़ रहे थे।
ध्रुव अपनी ग्रेजुएशन पूरी कर चुका था। उसके ज्यादातर दोस्त सेटल हो चुके थे। कुछ उसी की तरह काम होने पर भी बेरूजगार का जीवन जी रहे थे। वे स्कूल के दिनों में हमेशा उसकी गिनती अब्बल बच्चों में होती थी। लेकिन शिक्षा के बाद के हालात ध्रुव के लिए नए अनुभव से भरे थे।
ध्रुव के एक प्राइवेट जॉब कर रहा था। लेकिन कम वेतन पर बेतहाशा काम का भोज और समय पर वेतन के न न मिलने की बजह से वे अक्सर अपनी दिनचर्या को मैनेज करने में ही उलझा रहता।
न तो वह आगे की पढ़ाई कर पा रहा था और न ही कोई ढंग की नोकरी उसे मिल पा रही थी।
रोज़गार होते हुए भी वह बेरोजगार ही था।
वे बार-बार अपने बॉस से वेतन बढ़ाने की मांग कर रहा था। क्योंकि वे पिछले चार साल से बिना इंकरिर्मेंट के काम कर रहा था।
इस पर एक दिन बॉस ने रोब से कहा कि, अगर इतने में गुजारा नही होता, तो काम छोड़ दे।
ध्रुव जवानी के अल्लड़ दौर में था, उसने उसी दिन नोकरी छोड़ दी।
करीब एक महीने से वे घर पर ही था। और ऐसे में अचानक मिले काम ने उसकी उम्मीदों को बांध दिया था।
देर शाम तक किये काम से उसे 150 रुपये और मिठाई मिली।
पैसे तो कम ही थे, काम के हिसाब से । लेकिन मिठाई को देख ध्रुव ने चुपचाप रख लिए।
मिठाई घर ले जायूँगा तो माँ और बहन खुश हों जाएँगे। पापा भी तो खुश होंगे। ध्रुव ने खुद से कहा और घर की ओर वापिस चल दिया।
बजार से गुजरते हुये उसे ख्याल आया कि माँ ने कुछ समान लाने को कहा था। वह अपने दोस्त राघव की दुकान पर गया। कुछ पैसे दिए और कुछ उधार किया ।
राघव भी नोकरी की तलाश से हार कर अपनी दुकान खोल बैठा था। चाहता तो वो भी था कि वह एक बड़ा अधिकारी बने लेकिन परिस्तिथियों राघव उलझ गया।
ध्रुव के समान खरीदने में 100 रुपये खर्च हो गए। अब ध्रुव के पास 50 और पहले के दस रुपये बचे। इसी से उसने इस बार की दीवाली इतने पैसो से ही मनानी है।
अपने आप से ये कह कर वह आग बढ़ चला।
रास्ते मे उसे कॉलेज का दोस्त अंकुश मिला। जो अब एक मैनेजर बन चुका था। अंकुश ने बताया कि सब दोस्त इस दीवाली पर रीयूनियन करने का प्लान कर रहे है। क्या वह भी आएगा उनके साथ।
ध्रुव जाना तो चाहता था लेकिन उसकी जेब उसे जाने की इजाजत नही दे रही थी। ध्रुव ने अंकुश से व्यस्तता बताते हुये बात को टाल दिया।
ध्रुव सोच रहा था कि ये त्यौहार सब के लिए एक साथ क्यों आते है क्योंकि सबके त्यौहार मनाने की परिस्तिथि तो एक सी नहीं होती।
और फिर ध्रुव घर की और चल दिया।

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