क्या नितीश कुमार भी मुस्लिमों को किनारा करने की रणनीति अपना रहे हैं ?

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भाजपा के बारे में यह सब जानने लगे हैं की उसकी राजनीती में मुस्लिम चेहरों की कोई ज़रूरत नहीं होती ,या फिर जहाँ पड़ती भी है तो वह उस से मुस्लिम चेहरे को नहीं आज़माती। यूपी ,हरियाणा और अन्य के राज्यों में हुए चुनाव को देख लीजिए शायद ही किसी स्टेट इलेक्शन में भाजपा ने मुस्लिम उम्मीदवार को उतारा हो ,यही हाल लोकसभा के चुनाव में भी था। और पिछले दिनों बिहार में जो चुनाव हुए वहां भी यही देखने को मिला के 110 सीटों में से एक पर भी मुस्लिम उम्मीदवार को भाजपा ने नहीं उतारा ,उसके बावजूद भाजपा दूसरी सब से बड़ी पार्टी बन कर बिहार में सामने आई। लेकिन भाजपा के सहयोगी दल यानि जदयू ने 11 मुस्लिम उम्मीदवारों पर ज़रूर भरोसा जताया था लेकिन 15 वर्षों के एंटी इंकम्बेंसी और Lockdwon का गुस्सा नितीश कुमार को झेलना पड़ा ,और सीटों में बड़ी गिरावट आई और अर्ध शतक भी नहीं लगा सके। जदयू तीसरे नंबर पर चली गई और इस बार जदयू के एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को कामयाबी नहीं मिली.
जैसे तैसे एनडीए सरकार बनाने में कामयाब हुई ,नितीश कुमार सातवीं बार सीएम की कुर्सी पर ब्राजमान हो गए। बारी आई मंत्री मंडल के विस्तार का। हिसाब लगाया गया की सात मंत्री भाजपा के खाते होंगे और पांच जदयू के। हम और वीआईपी को एक एक। इस तरह मंत्री मंडल का बटवारा हुआ। इन सभी के बीच जिस चीज़ को लेकर बहस तेज़ होती दिखाई दे रही है वह मुस्लिमों को दरकिनार करने के लिए भाजपा के रास्ते पर जदयू के चलने की।
दरअसल बिहार की राजनीती इतिहास में पहली बार ऐसा देखने को मिल रहा है के एक भी मुस्लिम्म चेहरा मंत्री मंडल में शामिल नहीं है। मुसलमानों के विकास ,उनके कल्याण की ज़िम्मेदारी एक गैर मुस्लिम को दिया गया है। यानी बिहार में अशोक चौधरी को अल्पसंख्यक मंत्री बनाया गया ,हालाँकि अशोक चौधरी को साइंस व अन्य मंत्रालय भी दिया गया है.लेकिन अल्पसंख्यक मंत्रालय अशोक चौधरी को दिए जाने के बाद यह सवाल पूछा जाने लगा है की क्या नितीश कुमार भी मुस्लिमों को किनारा कर के आगे की राजनीती करना चाहते हैं क्या ? चूँकि यूपी में जब भाजपा ने कसी मुस्लिम उम्मीदवार को नहीं उतारा था उसके बावजूद जितने पर मोहसिन रज़ा को एमएलसी बना कर अल्पसंख्यक मंत्रालय दिया गया ,यहाँ जदयू के पास पहले से ही दो मुस्लिम एमएलसी खालिद अनवर और गुलाम रसूल बलियावी के रूप में मौजूद है ,फिर भी नितीश कुमार का उन्हें अल्पसंख्यक मंत्रालय नहीं देना क्या यह संकेत है की अब नितीश भी मुस्लिम को दरकिनार कर के रणनीति बनाने की कोशिश में हैं ? चूँकि अभी जो कुछ देखने को मिल रहा है उस से तो यही लग रहा है। लेकिन याद रहे के बिहार में अभी भू नितीश कुमार का मुस्लिम वोट बैंक मज़बूत है।

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