पुलवामा के बहाने नफरत की बढ़ती सियासत।

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Imran Iraqee

पुलवामा हमले के बाद देश भर में जिस तरह का जन-आक्रोश देखा गया और देखा जा रहा है, शायद ही इससे पहले देखने में आया होगा। देश भर के आम-जनों को किसी एक मुद्दे पर एक साथ, एक प्लेटफार्म पर आना किसी अचम्भे से कम नहीं। हालाँकि यह अच्छी बात है कि बाहरी ताकतों को जवाब देने के लिए एकजुटता दिखाई जाये। इससे जहाँ बाहरी ताकतों को हमारी एकजुटता का एहसास होता है वहीँ देश के राजनेताओं के लिए भी सन्देश जाता है कि अगर देश का आम-जन एकजुट हो जाये तो सत्ता की नींव भी हिला सकता है। लेकिन कहीं ना कहीं एक बात जो सामने आ रही है कि कहीं देश के आम-जनों को किसी रणनीति के तहत मोबलाइज़े तो नहीं किया जा रहा है। क्योंकि देखा जाये तो इन जन-समूहों के ज़रिये देश के कुछ नागरिकों को नुकसान भी उठाना पड़ रहा है। बल्कि इससे पहले भी देश में जन-समूहों (उग्र भीड़) के ज़रिये एक खास समुदाय को निशाने पर लिया गया है। हालाँकि जिस मुद्दे पर उन्हें निशाने पर लिया गया उससे सम्बंधित कानून हैं जिसके तहत कार्रवाई कर के उन्हें दण्डित किया जा सकता था। लेकिन अफ़सोस कि ऐसा नहीं हुआ। यह तो सभी ने माना की भीड़ तंत्र, लोक तंत्र के लिए खतरा है, लेकिन लोकतंत्र के बचाव के लिए भीड़तंत्र को रोका नहीं गया। और भीड़तंत्र ने वही किया जिसके लिए उन्हें मोबलाइज़े किया गया।

लेकिन इस बार जबकि लोक सभा चुनाव बेहद करीब है ऐसे में यह सवाल उभरना स्वाभाविक है कि कहीं इस पुरे मामले का राजनीतिकरण तो नहीं किया जा रहा है ? हालाँकि जिस तरह से राजनितिक पार्टियां एक-दूसरे पर कीचड़ उछाल रही हैं उससे काफी कुछ साफ़ हो जाता है। लेकिन यहाँ राजनीतीकरण का मामला इस लिए भी है कि आमजनो में ऐसी भावना का एक साथ जागना कोई छोटी बात नहीं। जहां लोग राजनेताओं के अत्याचार और उनके ज़रिये किये गए आवाम के अधिकारों का हनन के खिलाफ चूं-चरा तक नहीं करते वो अचानक से अंतरराष्ट्रिय और इस तरह के संवेदनशील मामले में कैसे एक आवाज़ बन गए? हालाँकि इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता की पुलवामा हमले ने देश की अंतरआत्मा पर हमला किया है। ज़ाहिर है इस तरह के हमले में जन-आक्रोश होना भी चाहिए। बल्कि यह जन-आक्रोश सरकार को ठोस कदम उठाने पर मजबूर भी करता है। लेकिन सवाल ये है की ऐसा अब से पहले क्यूँ नहीं हुआ ? इससे पहले भी देश के जवान सरहदों पर शहीद हुए हैं। इस तरह के हमलों का शिकार हमारे जवान अक्सर होते रहे हैं। लेकिन इस बार आम-जनों में जिस तरह का उबाल देखा जा रहा है, इसका अंदाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है की इसके जवाब में एक बड़ा समूह न्यूक्लियर-वॉर तक की बात करता है। क्या उन्हें पता नहीं की इस वॉर से सिर्फ किसी एक देश का नुकसान नहीं होगा, बल्कि इसकी ज़द में कई देश आ सकते हैं। क्या आस पास के देश न्यूक्लियर-वॉर से पैदा होने वाले हालात के लिए तैयार हैं ? क्या खुद भारत इसके लिए तैयार है ? और सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि इस वॉर में और इसके बाद जिस तरह की स्तिथि पैदा होगी, उसका उन्हें ज़रा भी अंदाज़ा है, क्या इस के सारे पहलुओं से वो बाख़बर भी हैं ? ऐसे कई सवाल हैं जिनके बारे में सोचा जाना बेहद ज़रूरी है। लेकिन यह भी इतना ही ज़रूरी है की पुलवामा हमले का मुँह-तोड़ जवाब दिया जाये। लेकिन कब और कैसे यह निर्णय करना सरकार और सेना का काम है। ना कि देश के आम-जनों का काम है। हमारे प्रधानमंत्री ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए ना सिर्फ इसकी कड़ी निंदा की है बल्कि यह ऐलान भी कर दिया है कि इस हमले का बदला लेने के लिए देश की सेना आज़ाद हैं। उन्हें खुद तय करना है कि कब, कहाँ और कैसे पुलवामा हमले का बदला लिए जाये।

लेकिन इनसब के बीच महत्वपूर्ण बात तो यह याद रखना चाहिए कि जब देश का आम-जन (जिनका यूनिफार्मनेस यानि समानीकरण करना या होना नामुमकिन है, और अगर किसी तरह से इनका समानीकरण किया जाये तो वो देश हित में घातक भी हो सकता है) खुद को किसी वॉर का हिस्सा बना लेता हैं तो उनके बीच ज़रा सा भी होने वाला मतभेद आपस में बड़ा विस्फोट पैदा करता है। यह ऐसा ही है जैसे किसी देश के आम-जन को वॉर-ज़ोन में तब्दील कर दिया जाये। ज़ाहिर है किसी देश का वॉर-ज़ोन में तब्दील हो जाना, उसके भीतरी आत्मा के लिए कितना घातक हो सकता है। इसके कुछ परिणाम आम कश्मीरयों पर होने वाले हमले के तौर पर भी देखा जा सकता है। पुलवामा हमले के बाद जिस तरह से कश्मीरियों और पाकिस्तान के नाम पर एक खास समुदाय के लोगो को निशाना बनाया गया है यह बड़ी हैरत और निंदनीय है। बल्कि इस मामले में हमारे एक सत्ताधारी नेता ने तो कश्मीरी सामान और कश्मीरियों के बहिष्कार की बात तक कह दी। जिसका असर देश के कई हिस्सों में देखा भी गया। इसका सीधा-सीधा मतलब तो यही बनता है कि देश में होने वाले एक बड़े हादसे का राजनीतिकरण किया जा रहा है। वजह चाहे जो भी हो देश के किसी हिस्से या राज्य का, किसी कारणवश बहिष्कार करना मसले का हल नहीं बल्कि उसे और बढ़ाना है। गौर किया जाये तो इससे गृह-युद्ध की स्तिथि बनती हुई नज़र आती है। और अगर ऐसा होता है तो बहरी ताकतों के लिए यह बड़ी कामयाबी मानी जाएगी।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कश्मीर को लेकर दो देशों में विवाद तो है ही लेकिन देश में भी ऐसी ही स्तिथि बन जाये तो यह खतरनाक है। सबसे पहले तो जिन अनुच्छेदों ने कश्मीर को एक विशेष राज्य का दर्जा दिया है, उस सिलसिले में सरकार को कोई ठोस कदम उठाना चाहिए, ना की उस पर राजनीती करे। कश्मीर मामले में अनुच्छेद 370 और 35A क्यों और किस स्तिथि में शामिल किया गया, इसके तमाम पहलुओं पर नए सिरे से सोचने की ज़रूरत है। और सबसे ज़्यादा ज़रूरत इस बात की है कि वर्तमान स्तिथि में क्या अब भी इन अनुच्छेदों की आवश्यकता है। क्या यह ज़रूरी है कि कश्मीर को देश के दूसरे राज्यों के मुकाबले विशेष राज्य के दर्जे में अब भी शामिल रखा जाये ? अगर नहीं तो सरकार कोई नया कानून बना कर इस मसले को हमेशा के लिए हल क्यों नहीं कर लेती ? एक आम नागरिक को इन अनुच्छेदों की बारीकी और इसकी संवेदनशीलता का एहसास शायद उस तरह से ना हो जिस तरह से देश के एक खास बुद्धिजीवी वर्ग को है। वो तो सिर्फ यह जनता है कि कश्मीर में एक अलग कानून लागु होता है और इसका एक अलग संविधान भी है। कश्मीर का अपना अलग ध्वज है। यह ज़रूरी नहीं की भारत के तमाम राज्यों में लागु होने वाला कानून कश्मीर में भी लागु हो। ज़ाहिर है ऐसी स्तिथि में भारत का ही आम नागरिक असहज महसूस करेगा। और इस असहजता का अक्सर राजनीतिकरण किया जाता रहा है। ऐसे में सोचने वाली बात यह है कि कहीं राजनेताओं ने जान बुझ कर इस मसले को हल नहीं करने का मन तो नहीं बनाया हुआ है क्यों की जब मसला हल हो जायेगा तो वोट की राजनीती किस बुनियाद पर किया जायेगा ?

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