मोबाइल एप लांच कर देना ही डिजिटल इंडिया नहीं है

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भारतीय रेल के 50 मोबाइल एप हैं। क्या रेल मंत्रालय का एक एप नहीं होना चाहिए था जहां से सारे एप तक पहुंचा जा सके। 50 एप का क्या मतलब है। क्या ये सारे एप डाउनलोड भी किए जाते हैं? पिछले दो साल में ही भारतीय रेल ने 25 मोबाइप एप बनाए हैं। तीन चार मोबइल एप को छोड़ कर बाकी किसी एप की कोई पूछ नहीं है। वे बेकार बन कर पड़े हुए हैं। उन्हें डाउनलोड करने वाला कोई नहीं है।कृषि मंत्रालय के 25 एप हैं। चावल उत्पादन को लेकर ही सात प्रकार के एप हैं। नेशनल मोबाइल गवर्नेंस इनिशिएटिव (NMGI) की वेबसाइट के अनुसार 30 प्रकार के एप हैं जिनमें एक मात्र भीम एप है जिसे एक करोड़ लोगों ने डाउनलोड किया है। बाकी एप सिंगल डिजिट में ही डाउनलोड किए गए हैं।

यह मेरी जानकारी नहीं है। 21 जुलाई के बिजनेस स्टैंडर्ड में करण चौधरी और शाइनी जेकब की रिपोर्ट है। दोनों ने यह बात उजागर की है कि डिजिटल इंडिया को सक्रिय दिखाने के लिए विभाग के बीच मोबाइल एप बनाने की होड़ मची है। एक ही बात के लिए कई कई एप बने हैं और जो काम एक एप में हो सकता है, उसके लिए अलग-अलग एप बनाए जा रहे हैं।ज़ाहिर है ज़्यादतर एप का मतलब आंखों में धूल झोंकना है। प्रचार पाना है कि बड़ा भारी काम हो गया है, एप लांच हो गया है। इस होड़ में सरकार ने 2000 से अधिक एप बना दिए हैं। एक मोबाइल एप को बनाने में पांच हज़ार से एक लाख तक ख़र्च आ जाता है।

राफाल लड़ाकू विमान का विवाद चल रहा है। सबके अपने अपने दावे हैं। रक्षा पर लिखने वाले अजय शुक्ला का लेख पढ़ा जा सकता है। यह लेख 22 जुलाई के बिजनेस स्टैंडर्ड के आखिरी पन्ने पर छपा है। अजय शुक्ला के लेख के कुछ अंश यहां हिन्दी में पेश कर रहा हूं।मोदी सरकार फ्रांस से 36 रफाल लड़ाकू विमान ख़रीद रही है। उससे पूछा जा रहा है कि एक विमान कितने का ख़रीदा जा रहा है। लोकसभा में रक्षा मंत्री ने 2008 के क़रार का ज़िक्र करते हुए कि इस सौदे का व्यावसायिक डिटेल पब्लिक में नहीं बताया जा सकता है। सरकार यूपीए सरकार के इस क़रार के कारण खामोश है वरना सब बता देती।

लेकिन सरकार ने यह नहीं बताया कि मार्च में जब फ्रांस के राष्ट्रपति भारत के दौरे पर थे जब इसी क़रार को भारत सरकार ने अगले दस साल के लिए बढ़ा दिया। सरकार की इतनी ही दिलचस्पी थी तो क़रार रद्द कर सकती थी या फिर दोनों बातें संसद में बताती है कि यूपीए ने जो क़रार किया था हमने भी वही क़रार किया है इसिलए कितने का विमान है, हम नहीं बताएंगे। जबकि ये जवाब भी रक्षा राज्य मंत्री संसद में पूछे गए एक सवाल के जवाब में बताया है।अजय शुक्ला ने लिखा है कि फ्रांस में समय समय पर यह जानकारी सार्वजनिक की जाती है कि हर रफाल की बिक्री पर सेना को कितने पैसे मिले हैं। वैसे में शायद ही फ्रांस भारत की परवाह करे। दूसरी ओर रक्षा राज्य मंत्री ने कहा है कि सरकार रफाल सौदे को सी ए जी को सौंप रही है। अगर वह सीएजी को सौंप सकती है जिसकी रिपोर्ट पब्लिक होती है तो फिर संसद में ही बता सकती थी।

अजय शुक्ला लिखते हैं कि 23 सितंबर 2016 को रक्षा मंत्रालय ने ख़ुद ही रफाल के दाम सार्वजनिक कर चुका है। रक्षा मंत्रालय के शीर्ष अधिकारी ने कुछ पत्रकारों के साथ ऑफ रिकार्ड ब्रीफिंग की थी जिसमें एक एक डिटेल बता दिया गया था। इसी ब्रीफिंग के आधार पर कई अखबारों में ख़बर छपी थी। 24 सितंबर 2016 के बिजनेस स्टैंडर्ड में लिखा है कि भारत ने 36 रफाल विमान के लिए 7.8 बिलियन यूरो का करार किया है। तब यह रिपोर्ट हुआ था कि बिना किसी जोड़-घटाव के सादे रफाल विमान की एक कीमत 7.4 अरब है तय हुआ है, यानी 700 करोड़ से अधिक। जब इन विमानों को भारत की ज़रूरत के हिसाब से बनाया जाएगा तब एक विमान की औसत कीमत 1100 करोड़ से अधिक होगी।

इस प्रकार रफाल सौदे की जानकारी तो पब्लिक में आ गई थी। ख़ुद रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण बोल चुकी थीं कि वे कुछ भी नहीं छिपाएंगी, देश को सब बताएंगी। लेकिन कुछ दिनों के बाद मुकर गईं और कह दिया कि फ्रांस और भारत के बीच गुप्त करार है और वे सौदे की जानकारी सार्वजनिक नहीं कर सकती हैं। उन्हें बताना चाहिए था कि जब वे बताने के लिए दावे कर रही थीं तब इस गुप्त करार की जानकारी थी भी या नहीं। दिसंबर 2017 से कांग्रेस रफाल डील को लेकर घोटाले का आरोप लगा रही है। उसका कहना है कि इस विमान के लिए हिन्दुस्तान एरोनोटिक्स लिमिटेड को सौदे से बाहर रखा गया और एक ऐसी कंपनी को प्रवेश कराया गया जिसकी पुरानी कंपनियों ने कई हज़ार करोड़ का लोन डिफाल्ट किया है। जिसकी वजह से बैंक डूबने के कगार पर हैं। ऐसी कंपनी के मालिक को इस सौदे में शामिल किया गया जिसका विमान के संबंध में कोई अनुभव नहीं है।

राहुल गांधी का आरोप है कि यूपीए के समय में एक रफाल विमान की कीमत 540 करोड़ थी, अब उसी विमान को मोदी सरकार 1600 करोड़ में किस हिसाब से ख़रीद रही है। प्रधानमंत्री ने ये जादू कैसे किया है। अविश्वास प्रस्ताव के दौरान राहुल गांधी ने इस बात को उठाते हुए दावा किया कि उनकी फ्रांस के राष्ट्रपित से मिला और उन्होंने बताया कि ऐसा कोई करार भारत और फ्रांस के बीच नहीं है। आप यह बात पूरे देश को बता सकते हैं। इस बयान के तुरंत बाद फ्रांस के राष्ट्रपति ने इसका खंडन कर दिया। बीजेपी इस बात को लेकर आक्रामक हो गई और राहुल गांधी के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया गया है।

आप खुद भी तमाम अखबारों में छपी इससे संबंधित ख़बरों को देख सकते हैं, अपनी लिस्ट बना सकते हैं कि क्या आरोप हैं और दोनों तरफ से क्या क्या तथ्य रखे जा रहे हैं और क्या क्या जवाब दिए जा रहे हैं। हिन्दी के अखबारों में आरोप प्रत्यारोप तो छप जाता है मगर दोनों तरफ के डिटेल नहीं दिए जाते हैं। अंग्रेज़ी में भी यही हाल है। कुछ और जानकारी मिलती है तो यहां अपडेट करूंगा।

रफ़ाल लड़ाकू विमान को लेकर लड़ाई किस बात की हो रही हैहमने इस विवाद को समझने के लिए बिजनेस स्टैंडर्ड में अजय शुक्ला और…

Posted by Ravish Kumar on Sunday, July 22, 2018

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