न्यायपालिका का बिना दबाव के काम करना जरूरी;CJI

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चीफ जस्टिस एनवी रमना ने बुधवार को एक ऑनलाइन लेक्चर में न्यायपालिका के रोल को लेकर अहम बातें कहीं. चीफ जस्टिस ने कहा कि न्यायपालिका को कार्यपालिका, विधायिका और आम जनता के दवाब से हटकर काम करना चाहिए. उन्होंने साथ ही इस बात पर भी ज़ोर दिया कि कोरोना संकट काल में लोगों पर अधिक दबाव बना है, ऐसे में हमें इसपर काम करना चाहिए कि कानून का राज किस तरह कायम रहे.
मुख्य न्यायाधीश की यह टिप्पणी तब आई है जब हाल के वर्षों में सरकार पर आरोप लगते रहे हैं कि असहमति और विरोध की आवाज़ को दबाया जा रहा है। इसके लिए यह तर्क दिया जाता है कि मीडिया की रिपोर्टिंग पर एफ़आईआर और यूएपीए व एनएसए के तहत मुक़दमे दर्ज करने के अंधाधुंध मामले आए हैं। इसमें विनोद दुआ और सिद्दीक़ कप्पन जैसे पत्रकार भी शामिल हैं। किसान आंदोलन जैसे प्रदर्शन को ख़त्म करने के लिए सरकार द्वारा सख़्ती किए जाने के आरोप लगते रहे हैं। सामाजिक मुद्दे उठाने वाले और सरकार की नीतियों की आलोचना करने वाले कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित करने और राजद्रोह जैसे मुक़दमे थोपे जाने के आरोप भी लगते रहे हैं। जैसे कि भीमा कोरेगाँव मामले से जुड़े कार्यकर्ता के मामले में आरोप लगाए जाते रहे हैं। विपक्षी दल के नेताओं पर विरोध की भावना से कार्रवाई के आरोप तो लगते ही रहे हैं।

जस्टिस पीडी देसाई मेमोरियल व्‍याख्‍यानमाला में ऑनलाइन भाग लेते हुए सीजेआई ने बुधवार को कहा, ‘यह हमेशा माना गया है कि हर कुछ वर्षों में शासक को बदलने का अधिकार अपने आप में निरंकुशता के खिलाफ गारंटी नहीं हो सकता. ‘CJI ने कहा कि यह विचार कि लोग परम संप्रभु हैं, मानवीय गरिमा और स्वायत्तता की धारणाओं में पाए जाते हैं और एक कार्यशील लोकतंत्र के तर्कसंगत सार्वजनिक संवाद लिए महत्वपूर्ण है. उन्‍होंने कहा कि ब्रिटिश शासन “कानून के शासन” के बजाय “कानून से शासन” के लिए प्रसिद्ध था. कानून में न्याय और समानता के विचारों को शामिल किया जाना चाहिए. प्रसिद्ध विद्वानों ने इसलिए तर्क दिया है कि किसी कानून को वास्तव में ‘कानून’ के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता है जब तक कि वह अपने भीतर न्याय और समानता के आदर्शों को आत्मसात नहीं करता है
. एक ‘अन्यायपूर्ण कानून’ में ‘न्यायपूर्ण कानून’ के समान नैतिक वैधता नहीं हो सकती है

 

 

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