अयोग्य होता जा रहा है झारखण्ड लोक सेवा आयोग !

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Imran Iraqee

झारखण्ड लोक सेवा आयोग द्वारा सहायक प्राध्यापक के लिए जारी किये गये नोटिफिकेशन (5/2018 और 4/2018) को आज लगभग चार महीने बीत गए। आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि से जोड़ा जाये तो आज लगभग तीन महीने पुरे हो गए। इन तीन से चार महीनों में इस विज्ञापन को लेकर कई अटकले लगातार बनी रही। किसी ने कहा ये विज्ञापन यूजीसी के नए नियमों के अनुसार नहीं है तो इसका कैंसिल होना तय है, ऐसे में इस विज्ञापन के लिए आवेदन देना सही नहीं। पैसे व्यर्थ चले जायेंगे। तो कभी यह भी सुनने में आया कि अगर आयोग इसी विज्ञापन पर बहाली ले भी लेती है तो भी अभ्यर्थियों को कई तरह की मुश्किलें पेश आएँगी। मसलन हो सकता है यूजीसी इन्हे सैलरी देने से ही इंकार कर दे। फिर आयोग और यूजीसी के बीच नियुक्त वयक्ति अपनी प्रोफेसरी में भी फकीरी का झोला उठाये घूमता रहेगा। इतनी अटकलों के बीच भी आयोग की तरफ से कोई स्पष्टीकरण भरी सूचना नहीं आई और आखिरकार मौके को गनीमत जानते हुए उम्मीदवरो ने आवेदन जमा कर दिया, ताकि कोई मलाल ना रहे। आयोग के ज़रिये किसी तरह की कोई नोटिफिकेशन न आना कोई आश्चर्य की बात भी नहीं. महीनो हो जाते हैं आयोग की वेबसाइट पर कोई नई नोटिस देखे। आयोग की वेबसाइट पर आखरी बार कोई नई नोटिस शायद महीना भर पहले अपलोड की गयी होगी। नोटिस के सामने कोई तिथि भी तो नहीं होती जो निश्चित तौर पर कहा जा सके। आयोग ने तो जैसे सारे तुरुष के पत्ते अपने ही हाथ में रखे हैं। अब हो सकता है आयोग के पास ऐसा कोई भी महत्वपूर्ण काम ना हो जिसे वेबसाइट पर अपलोड करना ज़रूरी समझा जाय। या यह भी हो सकता है कि आयोग के पास अभ्यर्थिओं से संबंधित काम से ज़्यादा कोई महत्वपूर्ण काम मौजूद हो। वैसे जानकारी के लिए यह भी बता दूँ कि आयोग ने राज्य में असैनिक सेवाओं के लिए अबतक सिर्फ छः बार परीक्षा ली है। यानि 18 साल के राज्य में अबतक सिर्फ छः बार और इन परीक्षाओं की भी अपनी राम कहानी है। खैर, आज की तारीख में भी आयोग ने विज्ञापन संख्या (5/2018 और 4/2018) के सम्बन्ध में कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है कि विज्ञप्ति यूजीसी के नए नियमो के अनुसार भरी जाएगी या नए नियमों को ताक पर रख कर उसी पुराने नियमो का ही पालन करेगी। दरअसल मसला यह भी है कि हमारे देश में समरूपता (हालाँकि समरूपता का ना होना इतना भी नकारात्मक नहीं) नहीं है। केंद्रीय संस्थान लाख नियम बना ले अगर राज्य सरकार या राज्य की संस्थान ना चाहे तो उसे इख़्तियार है की वो उसका पालन ना करे।

एक वो दिन था और एक आज का दिन है, विज्ञापन के सम्बन्ध में आज तक किसी तरह का कोई नोटिस नहीं। बस एक फॉर्म जारी किया गया अभ्यर्थियों से पांच सौ और हज़ार रूपये लिए गए और सो गए। ना कोई पूछने वाला और ना ही कोई बताने वाला। नौकरी के नाम पर बेरोजगारों से आवेदन शुल्क की शक्ल में मोटी राशि जमा करना आज कल  सरकारी संस्थानों का तो कारोबार बन गया है। लगभग हर राज्य का यही हाल है। रिक्त पदों के लिए फॉर्म निकले जाते हैं और आवेदन के नाम पर पांच सौ और हज़ार रूपये ऐंठे जाते हैं और सरकार उन पैसों से ऐश करती है। कुछ राज्यों की ऐसी भी संस्थानें हैं जो 1500 और दो हज़ार तक एक फॉर्म के लिए वसूलती है। ना कोई पूछने वाला और ना ही इन्हें किसी को जवाब देने  की ज़रूरत ही पड़ती है। बस फॉर्म में एक लाइन लिख  डालते हैं “विज्ञापन को कभी भी रद्द और इसमें फेर बदल करने का हक़ सिर्फ आयोग के पास है” कई फॉर्म में तो यह भी लिख दिया जाता है “विज्ञापन के रद्द होने की स्तिथि में फॉर्म शुल्क वापस नहीं किये जायेंगे” इतना सब कुछ लिखने के बाद भी कहते हैं देश हमारा लोकतंत्र है। मुझे तो अब हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट भी घर के उन बुज़र्गों की तरह लगने लगे हैं जो अपने छोटे बच्चों को फटकार लगते हुए कहते हैं “बेटा चॉक्लेट मत खाया करो, दांत ख़राब हो जायेंगे” लेकिन बच्चा भला कहाँ मानने वाला। उसे तो अपनी ही मनमानी करनी है। ख्याल रहे कि ऐसा कई दफा होता है जब हमें अपने बच्चो को सुधारने के लिए सजा देना भी ज़रूरी हो जाता है। कोर्ट को भी चाहिए की सिर्फ हुक्मनामा जारी ना करे बल्कि ना मानने वाले राज्य की सकारों के लिए सजा भी निर्धारित करे ।

लेकिन यहाँ सिर्फ राज्य के आयोग या सरकारी सस्थानों की ही बातें क्यों हों हमारे केंद्र के आयोग और सरकारी संस्थाने भी इस मामले में कुछ कम नहीं है। आप को जान कर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि केंद्रीय विश्विद्यालयों की भी स्तिथि इतनी ही दयनीय है। दिल्ली विश्विद्यालय ने भी साल 2017 में कई महाविद्यालयों में सहायक प्रोफेसर के खाली पदों के लिए विज्ञापन निकला था। जिनमे कॉलेजों के विज्ञापन संख्या (KMC/TS Apptt/2017, DSC/Admn/217/2017, SC/2017/01, ZHDC/002/2017) कुछ  इस तरह हैं। इन विज्ञापनों के लिए अभ्यर्थियों से छः सौ रूपये वसूले गए। और फिर मामला यह हुआ कि वसूली हुई और बात आई गई और शायद ख़त्म भी हो गई। आज तक इन विज्ञापनों के सम्बन्ध में कोई नोटिस जारी नहीं की गयी । विज्ञापन को कैंसिल कर दिया गया या परीक्षा और इंटरव्यू कब ली जाएगी ? कोई अता पता नहीं।  इस सम्बन्ध में कोई सुचना नहीं। अभ्यर्थी जैसे फॉर्म भरने के बाद भूल जाने के लिए ही होते हैं। क्या लोकतंत्र का यही रवैया होता है। अगर इसे ही लोकतंत्र कहते हैं तो मुझे यह लोकतंत्र मंज़ूर नहीं।

इससे भी ज़्यादा गंभीर मामला तो बिहार लोक सेवा आयोग का है। बिहार लोक सेवा आयोग ने साल 2014 में 3364 सहायक प्रोफेसर के पदों के लिए विज्ञापन (Advt. No. 44-84/2014) जारी किया गया था। विज्ञापन के लगभग दो बर्सों तक तो कुछ भी इस सम्बन्ध में प्रोग्रेस नहीं हुआ। दो वर्षों बाद आयोग की आँख खुली और आज चार साल से भी ज़्यादा का समय हो गया इस बहाली की परिक्रिया को अबतक पूरा नहीं किया गया। जानकारी के लिए आप को यह भी बता दें की लगभग तीन साल पहले ही राज्य में नई सरकार आई थी। मतलब नई सरकार आते ही पुरानी सरकार के द्वारा जारी किये विज्ञापन को ठन्डे बस्ते में डाल दिया जाता है। और यह कोई नई बात भी नहीं है। नई सरकार अपने नये लुभावने विज्ञापन जारी करती है। फिर होता यही है कि ना तो पुराने विज्ञप्तियों पर कोई काम किया जाता है और नए विज्ञप्तियों को तो इस लिए लाया ही जाता है कि अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में इसे पूरा कर के वोट बैंक तैयार किया जाये। लेकिन यह भी सब होता है तो कछुए की चाल से। दरअसल देखा जाये तो यह सारा मामला वोट बैंक का ही होता है। खास तौर से राज्य या केंद्र में शिक्षकों की बहाली तो सरकारों का चुनावी हथियार बन गया है। जो खास समय पर इस्तेमाल में लाया जाता है। इन दिनों इस विज्ञप्ति को लेकर आयोग में थोड़ी तेज़ी देखी जा सकती है लेकिन यह तेज़ी भी ऐसी ही है जैसे उसी कछुए को थोड़ी देर के लिए रेडबुल पिला दिया गया हो।

अब आइये फिर से झारखण्ड की ही बात करते हैं। मालूम हो कि झारखण्ड के महाविद्यालयों में अध्यापकों की खाली सीट के लिए साल 2008 में बहाली हुई थी। इसके बाद साल 2017 के अगस्त महीने में विज्ञापन जारी किया गया। इस विज्ञप्ति की तैयारी में भी आयोग को लगभग पांच से छः साल का वक़्त लग गया। क्योंकि पिछले पांच छः साल से इस विज्ञापन को लेकर अखबारों की सुर्खियों को कुछ इस तरह से सजाया गया कि अभ्यर्थियों की बाछें कभी खिलती तो कभी बंद होती रहीं। लेकिन आश्चर्य है कि लगभग नौ बरसों बाद निकाली गई इस विज्ञप्ति के सम्बन्ध में कोई प्रोग्रेस नहीं दिख रहा और आश्चर्य तो इस बात पर भी कीजिए कि झारखण्ड अलग राज्य बनने के बाद से महाविद्यालयों और स्नातकोत्तर विभागों के लिए अब तक की यह दूसरी विज्ञप्ति है। मतलब पुरे 18 साल के आरसे में झारखण्ड के महाविद्यालयों और स्नातकोत्तर विभागों के लिए अध्यापक के रिक्त पदों पर यह सिर्फ दूसरी बार विज्ञप्ति जारी की गई है। इसे देख कर तो ऐसा ही लगता है कि जैसे झारखण्ड के महाविद्यालयों और स्नातकोत्तर विभागों में अध्यापकों की कमी सरकार के लिए कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। हालाँकि देखा जाये तो इस 18 साल के अर्से में इन महाविद्यालयों से ना जाने कितने ही शिक्षक अपने कार्य से सेवानिवृत भी हुए होंगे। इसके बाद भी सरकार और आयोग का यह रवैया राज्य की शिक्षण वय्वस्था की पोल खोलता है। दरअसल सवाल तो इसी गर्भ से पैदा होते हैं कि क्या वाकईं झारखण्ड के महाविद्यालयों में अध्यापकों की कमी नहीं है ? या यह कि राज्य के नौजवानों को उच्च स्तरीय शिक्षा की ज़रूरत ही नहीं है ? या यह मान लिया जाये कि झारखण्ड के महाविद्यालयों को नए अध्यापकों की ज़रूरत ही नहीं है ? और यहाँ के नौजवानों को जो उच्च स्तरीय डिग्रीयां लिए नौकरी की आस में हैं, उन्हें नौकरी की ज़रूरत ही नहीं है ? सवाल तो कई हैं लेकिन सरकार और आयोग जवाब तो दे।

हाँ सांतवना देने और काम चलाने के लिए पिछले साल यानि 2017 में महाविद्यालयों के कई विभागों में अनुबंध पर शिक्षकों की बहाली कर ली गई है। इन बहालियों के ज़रिये आये शिक्षकों की भी हालत कुछ ऐसी ही है कि घर के हैं न घाट के। मतलब इनकी बहाली क्लास आधारित है। जितनी क्लासेज उतनी सैलरी। हर क्लास के लिए 600 रूपये। जिस दिन क्लास नहीं उस दिन कुछ नहीं। मतलब घर से दूर आप किसी कॉलेज के लिए नियुक्त भी हैं और क्लास ना मिलने पर उस दिन के लिए बेरोज़गार भी। शहर में स्तिथ कॉलेजों की स्तिथि फिर भी गनीमत जानिए कि शहर से दूर कॉलेजों की स्तिथि बद से बदतर को पहुँच गई है। कई ऐसे विभाग हैं जहाँ एक लम्बे समय से अध्यापकों की कमी की वजह से क्लास ही नहीं होती है ऐसे में विद्यार्थी भी नहीं आने लगे। अब जब अनुबंध पर अध्यापक आ गए हैं तो विद्यार्थी गायब हो गए हैं। ज़ाहिर है विद्यार्थी नहीं आएंगे तो क्लास नहीं होगी। क्लास नहीं होगी तो सैलरी नहीं बनेगी। मतलब जिस काम के लिए आप अपना वक़्त दे रहे, वो काम भी आप से नहीं लिया जा रहा है। आश्चर्य की बात तो यह है कि इस बहाली की पूरी परिक्रिया में भी लगभग एक साल से ज़्यादा का वक़्त लगा दिया गया है। यह है हमारे सरकार और आयोग का कारनामा जिस की वजह से राज्य तेज़ी से तरक्की कर रहा है……….

सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि आखिर इन भर्तियों में इतनी देरी क्यों होती है ? यह किस तरह की प्रक्रिया है जिस में इतना समय लग जाता है। ज्ञात हो कि झारखण्ड लोक सेवा आयोग ने इससे पहले प्रोफेसर और असोसिएट प्रोफेसर के लिए भी साल 2016 में विज्ञापन जारी की थी लेकिन आश्चर्य है कि उस विज्ञप्ति के सम्बन्ध में इंटरव्यू या किसी तरह की कोई भी नोटिस अबतक जारी नहीं की गयी । ना जाने कब इंटरव्यू होगा और कब बहाली की परिक्रिया अंतिम चरण तक पहुंचेंगी ? आयोग की वेबसाइट इस सम्बन्ध में कोई भी जानकारी देने में आयोग्य है। जबकि आकड़े बताते हैं की झारखण्ड की यूनिवर्सिटीयों में लगभग हज़ारों ऐसी सीट खाली है जहाँ अध्यापकों की सख्त ज़रूरत है। कई जगह तो अध्यापकों की घोर कमी की वजह से विभाग बंद कर दिए गए हैं।

Imran Iraqee

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